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इस जीत का संदेश

Wed, 29 Apr 2015 08:29 PM IST
अमर उजाला, नई दिल्ली
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पश्चिम बंगाल में स्थानीय निकायों के चुनाव में सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस की धमाकेदार जीत ने कई अटकलों को गलत साबित कर दिया है। शारदा चिटफंड घोटाले में मंत्रियों-सांसदों की लिप्तता व गिरफ्तारी और राज्य की बेहतरी के लिए ज्यादा कुछ न करने वाली तृणमूल अध्यक्ष ममता बनर्जी के लिए इस चुनाव को बड़ी परीक्षा बताया जा रहा था, क्योंकि अगले साल वहां विधानसभा चुनाव होने हैं।
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पर इन चुनावों में करीब अस्सी फीसदी इलाकों में जीत का झंडा गाड़कर दीदी ने जता दिया है कि विभिन्न वजहों से कमोबेश अलोकप्रिय होने के बावजूद फिलहाल उनका विकल्प नहीं है, तथा खासकर ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में उनकी मजबूत पकड़ बनी हुई है। यह नतीजा उस भाजपा के लिए बड़ा झटका है, जिसका विगत लोकसभा चुनाव में वोट प्रतिशत काफी बढ़ा था और उससे उत्साहित होकर पार्टी अध्यक्ष अमित शाह लगातार पश्चिम बंगाल के दौरे कर रहे थे। इसके बावजूद भाजपा एक भी नगरपालिका पर कब्जा नहीं जमा पाई।

हालांकि लोकसभा या विधानसभा चुनावों से स्थानीय निकायों के चुनाव की तुलना नहीं की जा सकती, लेकिन भाजपा की यह विफलता राज्य में उसकी कई कमियों की ओर इशारा करती है। जैसे, पश्चिम बंगाल में भाजपा का एक स्वीकार्य चेहरा तो नहीं ही है, इस विफलता ने वहां उसके सांगठनिक ढांचे के अभाव को भी बखूबी रेखांकित किया है। अलबत्ता तृणमूल की यह शानदार जीत भी विवादों से परे नहीं है। एक तो यही कि इस विजय में सत्ता की मशीनरी के गलत इस्तेमाल के आरोप के अलावा हिंसा भी हुई है, जो पश्चिम बंगाल में चुनाव जीतने का पुराना हथकंडा है।
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पर सवाल यह है कि जिस तृणमूल के सामने विपक्ष था ही नहीं, उसे सत्ता की ताकत का ऐसा इस्तेमाल क्यों करना पड़ा। खासकर कोलकाता में जैसी हिंसा हुई, उसका खुद तृणमूल नेताओं ने भी संज्ञान लिया है! इसके अलावा कोलकाता में ही भितरघात ने सत्ताधारी पार्टी को नुकसान भी पहुंचाया, जिसका सुबूत है, ममता बनर्जी के वार्ड भवानीपुर में तृणमूल की हार। इसके अलावा नतीजों ने बताया है कि वाम मोर्चा अभी खत्म नहीं हुआ है, खासकर सिलिगुड़ी में उसकी जीत बड़ी उपलब्धि है, तो अपने गढ़ उत्तर बंगाल में कांग्रेस भी मजबूत है। ऐसे में, अगले साल होने वाला विधानसभा चुनाव वाकई दिलचस्प होगा।
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