जनता दल (यू) की राष्ट्रीय परिषद में नीतीश कुमार ने नरेंद्र मोदी का नाम लिए बिना उनको और उनके विकास के मॉडल को जिस तरह से निशाना बनाया है, वह अप्रत्याशित बिल्कुल नहीं है, मगर इसमें छिपी चालाकी को समझा जा सकता है।
एक ओर यदि वह भाजपा को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने का अल्टीमेटम देकर मोदी की संभावनाओं पर सवाल खड़ा कर रहे हैं, तो दूसरी ओर वह खुद की धर्मनिरपेक्ष छवि को चमकाकर राष्ट्रीय परिदृश्य में अपने लिए जगह तलाशते भी दिखते हैं। उन्होंने जो कुछ कहा उसका सार यह है कि वह मोदी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पसंद नहीं करेंगे और इसके लिए वह राजग से अलग होने की हद तक भी जा सकते हैं।
ऐसा कहते हुए वह अटल बिहारी वाजपेयी के राजधर्म की भी याद दिलाते हैं और इशारों-इशारों में कहते हैं कि लालकृष्ण आडवाणी को यदि प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश किया जाए, तो उन्हें ऐतराज नहीं होगा। और जब वह ऐसा कहते हैं, तो कुछ बरस पुराना जुमला याद आ जाता है कि वाजपेयी तो अच्छे हैं, पार्टी गलत है! क्या वह यह कहना चाहते हैं कि भाजपा तो अच्छी है, मोदी गलत हैं?
वास्तव में नीतीश कुमार का यह रुख उनकी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा लगता है, जिसके जरिये वह अपने वोट बैंक को सुरक्षित रखना चाहते हैं। मगर क्या जद(यू) वास्तव में भाजपा का साथ छोड़ने की स्थिति में है? यह ऐसा सवाल है, जिसके बारे में जल्दबाजी में कुछ नहीं कहा जा सकता। मगर यह तय है कि 17 बरस पुराने गठबंधन को बचाए रखने की जिम्मेदारी भाजपा के साथ जद(यू) की भी बराबर की है।
असल में, गठबंधन राजनीतिक परिस्थितियों से भले उपजते हों, मगर यह साफ है कि राजग हो या यूपीए या कोई और गठबंधन, वह तभी चल सकता है, जब उसके घटक दल एक-दूसरे का सम्मान करते हैं और जरूरतों के हिसाब से कुछ झुकने को भी तैयार रहते हैं।
जद(यू) का आधार सिर्फ बिहार तक ही सीमित है, और यदि वह भाजपा से नाता तोड़ता है, तो वहां त्रिकोणीय संघर्ष की स्थिति बन जाएगी, जिसका खामियाजा उसे उठाना पड़ सकता है। इसके बावजूद ऐसा लगता है कि नीतीश धर्मनिरपेक्षता की राजनीति में अपनी संभावनाओं को बचाए रखना चाहते हैं।