उत्तर प्रदेश के शामली जिले के कांधला में एक ट्रेन में दो समुदाय के लोगों के बीच हुई मारपीट की घटना के बाद भड़की हिंसा को भले ही अब नियंत्रित कर लिया गया है। मगर इस घटना के बाद रेलवे स्टेशन और पुलिस थाने में हजारों लोगों की भीड़ जिस तरह से जमा हो गई और उत्पात मचाया, उससे समझा जा सकता है कि यह क्षेत्र सांप्रदायिक रूप से कितना संवेदनशील है।
इससे न केवल कई ट्रेनें प्रभावित हुईं, बल्कि हजारों यात्रियों का जीवन भी जोखिम में पड़ गया था। यह घटना बताती है कि अगस्त-सितंबर, 2013 में शामली और मुजफ्फरनगर में हुई सांप्रदायिक हिंसा की राख अभी ठंडी नहीं हुई है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इस गन्ना उत्पादक क्षेत्र में कड़वाहट घोलने वाली उस हिंसा में पचास से अधिक लोगों की मौत हो गई थी और पचास हजार लोगों को बेहद तंगहाली में शरणार्थी शिविरों में रहना पड़ा था। हालत यह है कि अब भी छह हजार से अधिक लोग इन शिविरों में रह रहे हैं।
वास्तव में सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण की राजनीति ने भी सूबे के माहौल को खराब किया है और चिंता की बात यह है कि ऐसे तत्वों को पूरी तरह से नियंत्रित नहीं किया जा सका है। अचानक तेज हुए धार्मिक स्थलों पर हमले और धर्मांतरण जैसे मसले दरअसल इसी की परिणति हैं, जिनकी आड़ में सांप्रदायिक माहौल को भड़काने की कोशिशें होती रहती हैं। अब बताया जा रहा है कि पिछले वर्ष अलीगढ़ में जिन मुस्लिम परिवारों ने कथित तौर पर धर्मांतरण कर हिंदू धर्म अपना लिया था, फिर से उनका धर्मांतरण कराने की तैयारी है!
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कुछ दिन पहले आशंका जताई थी कि राज्य सरकार के विकास कार्यों पर पर्दा डालने के लिए कुछ सांप्रदायिक ताकतें सूबे में घृणा फैला रही हैं। लेकिन क्या राज्य में सांप्रदायिक सद्भाव कायम रखने की प्राथमिक जिम्मेदारी उनकी सरकार की नहीं है? इसी तरह से इस पर भी गौर किया जाना चाहिए कि ऐसा क्यों हो रहा है कि पिछले वर्ष केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद से उत्तर प्रदेश सहित देश के दूसरे हिस्सों में ऐसे तत्व हावी हो गए हैं, जो हिंदुत्व के नाम पर समाज को बांटना चाहते हैं? वास्तव में शामली की घटना को एक सबक की तरह लेने की जरूरत है, ताकि निहित स्वार्थी तत्व माहौल को और न बिगाड़ें।