नई दिल्ली गैंगरेप के बाद अपराध कानून में संशोधन के लिए बनी न्यायमूर्ति जे एस वर्मा कमेटी ने एक महीने में अपनी रिपोर्ट सौंपकर जिस प्रतिबद्धता का परिचय दिया है, उसके प्रस्ताव भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। गृहिणियों, महिला संगठनों, मानवाधिकार संगठनों आदि की तरफ से आए करीब 80,000 सुझावों को गंभीरता से देखते हुए इतनी जल्दी रिपोर्ट पेश करना कोई मामूली काम नहीं था।
ध्यान देने की बात यह भी है कि दिल्ली गैंगरेप की पृष्ठभूमि में तैयार होने के बावजूद इसमें जनाक्रोश के सुर में सुर मिलाने के बजाय परिपक्व मानसिकता का परिचय दिया गया है। बलात्कारियों की फांसी या उनके रासायनिक बंध्याकरण की मांग को खारिज करने और किशोर अपराधों में बढ़ोतरी के बावजूद किशोर न्याय कानून में उम्र सीमा घटाने की मांग न मानने के पीछे यही सोच है, जिसकी प्रशंसा करनी चाहिए।
कमेटी ने बलात्कार के दुर्लभतम मामलों में भी मृत्युदंड की जगह आजीवन कारावास, यानी पूरी उम्र जेल में बिताने, की सजा तजवीज की है। उसके इस सुझाव के पीछे जहां दुनिया भर में फांसी के खिलाफ बनता जनमत और मानवाधिकारवादी आग्रह है, वहीं यह तथ्य भी है कि मृत्युदंड के बावजूद अपराध कम नहीं हुए हैं।
कमेटी ने यौन अपराधों का दायरा बढ़ाकर एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया है; जिसके तहत स्त्रियों को घूरने, परेशान करने और यौन इरादे से छूने आदि पर भी तीन से पांच साल की सजा का प्रावधान है, तो उसने खाप पंचायतों को भी महिलाओं के खिलाफ फतवे जारी करने से बाज आने को कहा है।
यह आकलन सही है कि अपराधों से निपटने के लिए हमारे यहां पर्याप्त कानून हैं, बस अपराधियों के खिलाफ सख्ती और भुक्तभोगियों के प्रति संवेदना बरतने की जरूरत है। इसके लिए आवश्यक है कि पुलिस सुधार तत्काल लागू हों, यौन अपराधों के मामले दर्ज किए जाएं और सेना के जवान सशस्त्र बल एकाधिकार कानून को यौन अपराध के खिलाफ ढाल की तरह इस्तेमाल न कर पाएं। छोटी-सी अवधि में यौन अपराध को इतनी व्यापक परिधि में देखना वाकई बड़ी उपलब्धि है। न्यायमूर्ति वर्मा कमेटी ने अपना काम कर दिया है, अब सरकार की जिम्मेदारी है कि वह इसकी सिफारिशों को कानून की शक्ल दे।