लगातार घाटे में चल रहे रेलवे को उबारने के लिए यात्री किराये में बढ़ोतरी निश्चित ही अपरिहार्य हो गई है, मगर रेल मंत्री ने इसके लिए जो समय चुना है, उससे सरकार की मंशा समझी जा सकती है। रेल बजट से महज महीने भर पहले यात्री किराये में बढ़ोतरी का फैसला रेलवे की सेहत सुधारने से कहीं अधिक सरकार की छवि को बचाने की कवायद लगता है।
असल में अगले कुछ महीनों के दौरान ही कई महत्वपूर्ण राज्यों के विधानसभा तथा एक साल बाद आम चुनाव होने हैं, ऐसे में सरकार नहीं चाहती कि बजट में किसी तरह की कठोरता दिखाई जाए। यह तर्क अपनी जगह ठीक है कि एक दशक से यात्री किराये नहीं बढ़ाए गए थे, जबकि परिचालन और स्थापन खर्च लगातार बढ़ता गया है। मगर यह रेलवे के साथ की जाने वाली राजनीति का ही नतीजा है कि इसका घाटा इस बार 20,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 25,000 करोड़ रुपये होने का अनुमान है।
दरअसल गठबंधन की राजनीति के दौर में रेलवे को सियासी सौदेबाजी का जरिया बना दिया गया, जिसके कारण रेलवे की तमाम योजनाएं ठप पड़ गईं। प्रकारांतर में रेल मंत्रियों ने अपने क्षेत्रीय और राजनीतिक हितों के चक्कर में यात्री किराये में बढ़ोतरी रोक कर रखी, जिसका असर रेलवे के आधुनिकीकरण, उसके विस्तार और यात्री सुरक्षा आदि पर पड़ा। सरकार भले ही यह तर्क दे कि ताजा बढ़ोतरी का असर आम यात्रियों पर कुछ खास नहीं पड़ेगा, पर यह उस पर अकेली मार नहीं है।
खुद रेल मंत्री ने माल भाड़े में बढ़ोतरी से इनकार नहीं किया है। अगर माल भाड़ा भी बढ़ाया गया, तो यह आम लोगों पर दोहरी मार होगी, क्योंकि इसके कारण महंगाई और बढ़ जाएगी। सरकार ने रसोई गैस सिलेंडरों और डीजल में बढ़ोतरी के संकेत भी दे रखे हैं। जबकि रिजर्व बैंक महंगाई को लेकर पहले ही चेतावनी दे चुका है कि इसमें कमी आए बिना वह ब्याज दरें नहीं घटाएगा। अच्छा तो यह होता कि रेलवे को राजनीति से मुक्त रखकर व्यावहारिक तरीके से किराये बढ़ाए जाते, जिससे यात्रियों पर भी भार नहीं पड़ता। मगर दुर्भाग्य से सरकार अपने राजनीतिक हितों को ध्यान में रखकर फैसले करती है, जिसका असर आम आदमी के साथ-साथ अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है।