झारखंड में नक्सलवाद की कमर तोड़ देने के लगातार दावे किए जा रहे थे, लेकिन उसके एक अपेक्षाकृत शांत समझे जाने वाले जिले में घात लगाकर एसपी समेत कई पुलिसकर्मियों की हत्या कर नक्सलियों ने जताया है कि अप्रासंगिक होना तो दूर, वे अब भी पहले की तरह खतरा बने हुए हैं।
पुलिस काफिले में से एसपी, उनके ड्राइवर और अंगरक्षकों को निशाना बनाकर नक्सलियों ने अपनी अचूक रणनीति का तो परिचय दिया ही, उतनी ही स्तब्ध करने वाली बात यह कि कार्रवाई उस पाकुड़ जिले में हुई, जहां नक्सली गतिविधियां कम ही देखी गई हैं; सिर्फ अमरपाड़ा और पाकुड़िया थाने में ही अब तक उनकी थोड़ी-बहुत उपस्थिति बताई जाती थी। लेकिन बीस लोगों के पुलिस काफिले का मुकाबला करने के लिए काठीकुंड के पास पचास से साठ नक्सलियों की मौजूदगी बताती है कि यह कार्रवाई योजनाबद्ध तरीके से की गई।
अगर यह बात सच है कि काफिले को रोकने के लिए नक्सलियों ने बारूदी सुरंग में विस्फोट किया, तो समझा जा सकता है कि उनकी तैयारी किस हद तक थी। दूसरी तरफ पुलिस-प्रशासन की उदासीनता का नमूना यह कि एसपी के काफिले के साथ वैसी अचूक सुरक्षा-व्यवस्था नहीं थी, जैसी कि होनी चाहिए। बल्कि बताते हैं कि नक्सली हमले की आशंका न देखते हुए पिछले काफी समय से पुलिस अधिकारियों की आवाजाही में सुरक्षा मानकों का ध्यान भी नहीं रखा जा रहा था!
जबकि अलग झारखंड राज्य बनने से पहले वर्ष 2000 में लोहरदग्गा के एसपी की हत्या नक्सलियों ने इसी तरह घात लगाकर की थी। सिर्फ यही नहीं कि विगत मई में छत्तीसगढ़ की दरभा घाटी में हुए भीषण नक्सली हमले से कोई सबक नहीं लिया गया, बल्कि इस आशंका से भी आंखें मूंद ली गईं कि नक्सलियों पर दबाव बढ़ने और पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनाव को देखते हुए इलाके में नक्सलियों की मौजूदगी बढ़ सकती है।
झारखंड का दुर्भाग्य तो यह भी है कि करीब छह महीने से वहां कोई सरकार नहीं है। और अब राष्ट्रपति शासन की समयसीमा पूरी होने से पहले जो लोग मिल-जुलकर सरकार बनाने का गुणा-भाग लगा रहे हैं, वे नक्सल समस्या के समाधान के बारे में कुछ सोचेंगे, इस पर भी संशय है।