यह बेशक आश्वस्त करने वाली बात है कि लंबी मुठभेड़ के बाद हमारे सैनिकों ने जम्मू में तीन आतंकवादियों और कश्मीर के कुपवाड़ा में करीब एक दर्जन घुसपैठियों को ढेर कर दिया है, लेकिन इस कोशिश में एक लेफ्टिनेंट कर्नल समेत कई सुरक्षाकर्मियों और आम आदमी की मौत दुखद है।
बृहस्पतिवार की सुबह सेना की वर्दियों में कुछ आतंकवादियों ने कठुआ की एक पुलिस चौकी पर जिस तरह हमला बोला, फिर वहां से ट्रक पर सवार होकर सांबा स्थित सैन्य शिविर में हिंसक कार्रवाई करने में भी सफल हो गए, वह सीमा से सटे इलाके में हमारी सुरक्षा-व्यवस्था पर टिप्पणी ही है। अलबत्ता हमारे जांबाज सैनिकों ने घाटी में घुसपैठ की पाकिस्तानी कोशिश को जिस तत्परता से नाकाम किया, वह तारीफ के काबिल है।
दरअसल नवाज शरीफ ने जब से भारत के साथ संबंध बेहतर करने की बात कही है, तभी से पाक सेना की भारत-विरोधी आक्रामकता में तेजी आई है। वह न सिर्फ नवाज शरीफ सरकार पर अपना वर्चस्व बनाए रखना चाहती है, बल्कि भारत के साथ दोस्ताना रिश्ता बनाने की संभावना को ही खत्म करने की मंशा पाले हुए है।
अमेरिकी सैनिकों के निकल जाने के बाद अफगानिस्तान में भारत को किनारे कर अपना वर्चस्व स्थापित करने की योजना बनाती पाक सेना की मंशा का सुबूत उसकी पत्रिका में हाल ही में छपे भारत-विरोधी एक लेख से भी मिलता है। वस्तुतः संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में भाग लेने अमेरिका गए मनमोहन सिंह की नवाज शरीफ से मुलाकात होनी है, और यही बात उन कट्टरवादियों को चुभ रही है। ऐसे में पाकिस्तान से बातचीत टाल देना तो उनके जाल में फंस जाना ही होगा। लेकिन जो हालात हैं, उनमें केवल वार्ता ही समस्या का समाधान नहीं है, बल्कि पाकिस्तान को सख्त संदेश देने की भी जरूरत है।
चूंकि पाक सेनाध्यक्ष परवेज अशरफ कयानी के नवंबर में रिटायर होने की बात है, लिहाजा इस्लामाबाद पर दबाव बनाने का यही उचित समय है, ताकि सेना में नेतृत्व परिवर्तन के दौर से गुजरता पाक अपने मौजूदा भारत-विरोधी रवैये पर लगाम लगाए। नवाज शरीफ को साफ-साफ बता देना होगा कि वार्ता तो ठीक है, लेकिन सीमापार से ऐसी हरकतें बर्दाश्त नहीं की जाएंगी।