आईएनएस विक्रांत का जलावतरण फिलहाल एक प्रतीकात्मक घटना से अधिक भले न हो, लेकिन इससे एशिया में एक मजबूत नौसैनिक शक्ति के रूप में छाने का भारत का भरोसा और मजबूत हुआ है। गौरतलब है कि इस आकार के विमानवाहक पोत की डिजाइन एवं निर्माण की क्षमता अमेरिका, ब्रिटेन, रूस एवं फ्रांस के पास ही है।
चीन ने पिछले साल अपना जो पहला विमानवाहक पोत लांच किया, उसका ढांचा उसने यूक्रेन से लिया था। सबसे बड़ी बात यह कि इस साल के आखिर तक अगर एडमिरल गोर्शकोव यानी आईएनएस विक्रमादित्य हमें रूस से मिल जाता है, तो दक्षिण एशिया में दो विमानवाहक पोत वाला भारत अकेला देश होगा; आईएनएस विराट पहले से ही हमारी नौसेना में शामिल है।
हाल ही में देश की पहली और आईएनएस विक्रांत की तरह स्वदेशी तकनीक से तैयार परमाणु ईंधन चालित पनडुब्बी आईएनएस अरिहंत का रिएक्टर भी चालू हुआ है। इन सब से कुल मिलाकर समुद्र में हमारी सैन्य तैयारी को धार मिलने जा रही है।
बेशक हमारे तमाम विमानवाहक पोत आकार में तुलनात्मक रूप से छोटे हैं, हमारे तीनों विमानवाहक पोत चीन के इकलौते पोत से छोटे हैं, लेकिन इनका होना ही सैन्य शक्ति में नई जोश और ऊर्जा भर देने के लिए काफी है। विक्रांत के जलावतरण पर चीन ने जैसी सशंकित प्रतिक्रिया दी है, उसी से पता चलता है कि समुद्र में उसे भारत की ओर से कड़ी चुनौती मिलने जा रही है, क्योंकि विक्रांत के जरिये भारत प्रशांत महासागर पर चौकसी रख सकेगा।
इसे भारतीय नौसेना का हिस्सा बनने में हालांकि समय लगेगा, क्योंकि अभी इसमें पच्चीस फीसदी काम बाकी हैं, जिसके बाद 2018 तक उसे नौसेना को सौंपे जाने की उम्मीद है। भारतीय जंगी बेड़े में 2020 से पहले वह शायद ही शामिल हो सके। रक्षा क्षेत्र में होने वाली देरी का हमारी तैयारियों पर तो असर पड़ता ही है, इससे आर्थिक बोझ भी बहुत बढ़ जाता है। एडमिरल गोर्शकोव का ही उदाहरण लें, तो इस पर पिछले लगभग एक दशक से काम चल रहा है, पर हमारी नौसेना के बेड़े में उसके इस साल शामिल होने की उम्मीद है। अलबत्ता देर से ही सही, हम नौसैनिक क्षेत्र में खुद को एक बड़ी ताकत बना रहे हैं, तो यह उपलब्धि तो है ही।