करीब एक पखवाड़े तक विश्व अर्थव्यवस्था को सांसत में रखने के बाद आखिरी वक्त पर हुई सहमति से अमेरिका में आंशिक कामबंदी खत्म भले हो गई हो, पर न तो समस्या अभी पूरी तरह सुलझी है और न ही उपद्रवी रिपब्लिकन्स को कोई बड़ी राहत मिली है। कहां तो वे ओबामा द्वारा शुरू की गई हेल्थकेयर योजना को वापस लेने की मांग कर रहे थे और कहां इस कानून में फर्जीवाड़ा रोकने के लिए सख्त व्यवस्था लागू करने के ओबामा प्रशासन के आश्वासन पर ही उन्हें संतोष करना पड़ा है।
कुछ हासिल होना तो दूर, उलटे अमेरिकी अर्थव्यवस्था को बंधक बनाए रखने के कारण उन्हें तालिबान तक कहा गया, और जनमत सर्वेक्षण में उनका ग्राफ भी काफी नीचे चला गया। यह ठीक है कि अमेरिका में आंशिक कामबंदी नई नहीं है, यह भी सही है कि वहां के सांसद आखिरी वक्त में संकट टालने की गंभीरता दिखाते हैं, लेकिन जब विश्व अर्थव्यवस्था संकट के मुहाने पर हो, तब प्रतिनिधि सभा में रिपब्लिकन्स के आचरण से यह लगा नहीं कि वे दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र के नुमाइंदे हैं।
उनकी जिद से अमेरिकी अर्थव्यवस्था को लगभग पच्चीस अरब डॉलर का नुकसान हुआ है, जिसका असर चौथी तिमाही के प्रदर्शन पर पड़ना तय है। यह गतिरोध टला है, तो जाहिर है, विश्व अर्थव्यवस्था ने राहत की सांस ली है। अगर समय पर सहमति नहीं बनती, तब भी अमेरिका पर एकाएक कोई पहाड़ बेशक नहीं टूटता, लेकिन शेयर बाजार से लेकर मुद्रा बाजार तक जैसा तूफान आता, और अमेरिकी डॉलर व बांड की विश्वसनीयता की दुनिया भर में जैसी भद पिटती, उसकी कल्पना ही की जा सकती है।
चूंकि चीन जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था भी अमेरिकी बांडों को सबसे सुरक्षित निवेश मानती है, ऐसे में महाशक्ति देश की बदहाली वैश्विक बदहाली की वजह बन जाती। हालांकि यह भी उतना ही देखने लायक है कि गतिरोध खत्म होने का विश्व बाजार ने जैसा स्वागत किया है, वैसा हमारे बाजार ने नहीं। कॉरपोरेट घरानों को शिंकजे में कसने, आर्थिक विकास दर घटने का अंदेशा जताने और डॉलर की मजबूती को इसकी वजह बताया जा रहा है। लेकिन स्थिति जिस तरह बदल रही है, उसमें भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रति उम्मीद तो बनती ही है।