दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद की समाप्ति के बाद लगातार पांचवीं बार चुनाव जीतकर अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस (एएनसी) ने यह तो जता दिया है कि उसका कोई विकल्प नहीं है, पर नेल्सन मंडेला की मृत्यु से उपजी सहानुभूति लहर के बावजूद पार्टी के वोट प्रतिशत में आई कमी कुछ और भी कहती है।
दूसरी ओर, प्रमुख विपक्षी पार्टी डेमोक्रैट एलांयस का न सिर्फ वोट प्रतिशत बढ़ा है, बल्कि विपक्ष अगर बिखरा हुआ नहीं होता, तो सत्ताधारी अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस को ज्यादा नुकसान हो सकता था। इसलिए जैकब जुमा के लिए यह खुश होने के बजाय खुद को साबित करने का अवसर ही ज्यादा है। हकीकत यह है कि बीस साल पहले जिन सपनों को पूरा करने के लिए मंडेला के नेतृत्व में यह पार्टी सत्ता में आई थी, उनमें से अनेक सपने अब भी अधूरे हैं।
चूंकि अब मंडेला नहीं हैं, इसलिए समर्थकों से पहले जैसी निष्ठा और समर्थन की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। तब तो और नहीं, जब पिछले बीस वर्षों में सरकार गरीबों की एक बड़ी आबादी को बुनियादी सहूलियतें तक मुहैया नहीं करा पाई हैं। ऐसे में, हाशिये के वही लोग अब सरकार से नाराज हैं, जो कभी इसकी जीत पर अभिभूत थे। दक्षिण अफ्रीका की सबसे बड़ी चुनौती अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर है।
ब्रिक्स के इस सदस्य देश की आर्थिक विकास दर पिछले साल 1.9 फीसदी थी, जबकि बेरोजगारी का आंकड़ा करीब पच्चीस प्रतिशत है। सत्ता में आने के बाद एएनसी ने आर्थिक गैरबराबरी समाप्त करने के लिए विकास, रोजगार और पुनर्वितरण का नारा दिया था, पर उसकी विफलता के बाद राष्ट्रीय विकास योजना का नया जुमला गढ़ा गया है। दक्षिण अफ्रीका में वामपंथी श्रम संगठनों की मजबूत पैठ है, जो आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित करने की ताकत रखते हैं।
ऐसे में, निवेशकों को लुभाने की नई अर्थनीति अपने आप में बहुत कारगर नहीं हो सकती; मंडेला भी इस मोर्चे पर कुछ खास नहीं कर पाए थे। जैकब जुमा ने अब रोजगार सृजन के अलावा ढांचागत परियोजनाओं में प्रगति का भरोसा दिया तो है, पर अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदलने के लिए योजनाबद्ध ढंग से काम करना पड़ेगा। भ्रष्टाचार ने भी दक्षिण अफ्रीका के आर्थिक सुधार कार्यक्रमों को बाधित किया है। ऐसे में, जुमा की दूसरी पारी पर स्वाभाविक ही सबकी नजर रहेगी।