मोदी सरकार के एक वर्ष के जश्न में जमीन अधिग्रहण का विवाद ग्रहण की तरह लग रहा है, जिस पर सुलह का रास्ता नजर नहीं आ रहा। संशोधित विधेयक पर सहमति नहीं बनने के कारण सरकार ने तीसरी बार जमीन अधिग्रहण से संबंधित अध्यादेश जारी किया है।
प्रधानमंत्री मोदी ने हालांकि यह कहा है कि जमीन अधिग्रहण विधेयक उनके लिए जीने-मरने का प्रश्न नहीं है, लेकिन यह भी सच है कि सरकार के लिए आज जमीन अधिग्रहण का मसला ही सबसे बड़ी चुनौती है। विपक्षी दल ही नहीं, बल्कि किसान-मजदूर संगठन तक इस विधेयक पर ऐतराज कर रहे हैं। जिन दो मुद्दों पर विवाद हैं, वे हैं, संबंधित भू स्वामियों और किसानों की सहमति की अनिवार्यता को खत्म करना तथा जमीन अधिग्रहण की वजह से संबंधित क्षेत्र में सामाजिक आर्थिक प्रभाव का अध्ययन।
मोदी सरकार ने यूपीए सरकार के समय पारित कानून से ये दोनों प्रावधान हटा लिए हैं। इसमें दो मत नहीं कि 80 फीसदी भूस्वामियों की सहमति लेना कठिन है। हमने देखा ही है कि किस तरह सिंगुर में नैनो फैक्टरी के लिए जमीन अधिग्रहण को लेकर विवाद के बाद टाटा को गुजरात जाना पड़ा। इसके पीछे की राजनीति को दरकिनार कर दें, तो भी सभी भूस्वामियों को राजी करना आसान नहीं। एक उदाहरण यह भी है कि बस्तर में टाटा का प्रस्तावित इस्पात संयंत्र जमीन अधिग्रहण के विवाद के कारण आज तक नहीं बन सका, जबकि काफी संख्या में वहां जमीन के कब्जेधारियों को मुआवजा मिल चुका था।
बेशक ये दोनों मामले पुराने जमीन अधिग्रहण कानून के समय के हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि मोदी सरकार किसानों, आदिवासियों और जमीन पर आश्रित अन्य लोगों का भरोसा नहीं जीत सकी है। दूसरी ओर यदि जमीन अधिग्रहण को लेकर संघर्ष और कानूनी लड़ाई की स्थिति रहेगी, तो भला निवेशक क्यों दिलचस्पी दिखाएगा? जरूरत निवेशकों और भूस्वामियों के बीच के अविश्वास को कम करने की है।
क्या कोई ऐसा रास्ता नहीं निकाला जा सकता, जिसमें भूस्वामी को भी संबंधित परियोजनाओं में हिस्सेदार बनाया जा सके, ताकि वह आश्वस्त हो सके कि उसे अपनी ही जमीन पर खड़े संयंत्र में मजदूरी करने को विवश नहीं होना पड़ेगा? असल में सरकार को सिर्फ संसद के भीतर ही नहीं, बल्कि बाहर भी ऐसी सहमति बनाने की जरूरत है।