वैसे तो कमोबेश पूरे देश में ही स्त्रियां पुरुषवर्चस्ववादी समाज के निशाने पर हैं, लेकिन हरियाणा में स्थिति कुछ ज्यादा ही चौंकाने वाली हैं। इस महीने की शुरुआत में हिसार में एक दलित लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया और उसकी फिल्म बनाई गई। लड़की का पिता यह शर्मिंदगी झेल न सका और उसने अपनी जान दे दी। पर उस बर्बरता में भागीदार सभी अपराधी अभी तक पकड़े नहीं गए हैं।
इसी तरह दो दिन पहले जींद में दिन-दहाड़े एक स्त्री को तीन वहशियों ने न सिर्फ शिकार बनाया, बल्कि उसका एमएमएस भी बनाया। इस मामले में पुलिस कार्रवाई के लिए तभी आगे बढ़ी, जब पीड़ित महिला ने आत्महत्या करने की धमकी दी। हिसार वाले मामले में भी पुलिस-प्रशासन ने शुरुआत में न सिर्फ जांच-पड़ताल में हीला-हवाली की, बल्कि गलत लोगों को पकड़कर जांच को भटकाने की भी कोशिश की।
पिछले एक महीने में हरियाणा में सामूहिक बलात्कार के और भी मामले सामने आए हैं, जो राज्य में अपराधियों के बढ़ते दुस्साहस और प्रशासन की अकर्मण्यता का ही सुबूत हैं। हरियाणा कन्या भ्रूणहत्या में शीर्ष पर है ही, पुरुषों के मुकाबले स्त्रियों का अनुपात भी यहां कदाचित सबसे कम है।
लेकिन सामूहिक बलात्कार की इन घटनाओं को सिर्फ स्त्रियों के खिलाफ बर्बरता कहकर खारिज नहीं किया जा सकता, बल्कि इनके पीछे दलितों को सबक सिखाने की वह खतरनाक मानसिकता भी काम कर रही है, जिसका नमूना हम गोहाना, मिर्चपुर, भगाना, हिसार और करनाल आदि में देख चुके हैं।
यह जातिवादी सोच तो खैर शर्मनाक है ही, पर सत्ता-राजनीति और पुलिस-प्रशासन का उदासीन रवैया उससे भी अधिक क्षुब्ध करता है, जो अपराधियों के प्रति सिर्फ इसलिए ढील बरतता है, क्योंकि उनके राजनीतिक संपर्क हैं। इसी हरियाणा में सामूहिक बलात्कार का शिकार हुई एक लड़की को इसलिए खुदकुशी के लिए मजबूर होना पड़ा, क्योंकि दरिंदे उसके परिचित थे, फिर भी प्रशासन उसे न्याय दिलाने के लिए तैयार नहीं था! दिल्ली से सटे कांग्रेस शासित राज्य में दलित समुदाय के खिलाफ सुनियोजित कार्रवाई हैरान करने वाली तो है ही, उत्तर प्रदेश में दलितों के घर ठहरने वाले राहुल गांधी को भी हरियाणा के दलितों की याद नहीं आती। क्या कोई हुड्डा सरकार को उसके कर्तव्य की याद दिलाएगा!