पंजाब के दीनानगर में हुए आतंकी हमले पर गृह मंत्री राजनाथ सिंह के संसद में दिए बयान से साफ हो गया है कि इसे सीमा पार से ही अंजाम दिया गया था। मगर, हमले के तुरंत बाद पंजाब के पूर्व पुलिस प्रमुख केपीएस गिल ने जो कुछ कहा, उसे एक बड़े खतरे का संकेत मानना चाहिए। गिल ने इस हमले को आईएस यानी इस्लामिक स्टेट का विजिटिंग कार्ड करार दिया था, जिसका अर्थ है कि इस हमले के जरिये इस्लामिक स्टेट भारत में अपनी संभावनाएं तलाश रहा है। और यह इत्तफाक नहीं है कि ठीक इसी समय एक अमेरिकी अखबार ने पाकिस्तान के कबाइली इलाके से बरामद इस्लामिक स्टेट के एक दस्तावेज के हवाले से इस खूंखार अतिवादी संगठन के मंसूबों का खुलासा किया है कि किस तरह वह भारत में बड़े हमले की तैयारी कर रहा है!
बेशक, अमेरिका की अगुआई में पश्चिमी फौज ने सीरिया और इराक में आईएस के कब्जे से कुछ हिस्से दोबारा हासिल किए हैं, लेकिन आईएस के खिलाफ अब तक वह कोई निर्णायक जीत हासिल नहीं कर सकी है। बल्कि अब यह साबित होता जा रहा है कि खासतौर से इराक में अमेरिकी रणनीति नाकाम होती जा रही है। सच तो यह है कि आईएस ने अफ्रीका और अरब दुनिया के अनेक देशों तक विस्तार करने के बाद तुर्की के रास्ते से यूरोप में घुसने की कोशिश की ही है। ऐसे में उसकी ताकत को कम करके नहीं आंका जा सकता। उसकी साजिश में अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बिखरे तालिबान गुटों और अल कायदा को जोड़ने की योजना शामिल है। वह अमेरिका से अपनी लड़ाई को भारत की ओर मोड़कर 'महायुद्ध' में बदलने की साजिश कर रहा है, तो उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।
सोचने वाली बात यह है कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान जैसे देश, जो खुद भी आतंकवाद से जूझ रहे हैं, आईएस के लिए भी खाद-पानी मुहैया करा रहे हैं। यह अकारण नहीं है कि घाटी में हाल के दिनों में पाकिस्तान के साथ ही आईएस के झंडे भी लहराते देखे गए हैं। दरअसल आईएस का उभार जिस तरह से हुआ है, वह सिर्फ हिंसा और हथियारों के दम पर नहीं हुआ है, बल्कि इसके पीछे एक खास तरह की कट्टरता है, जो दुनिया को मध्ययुग की ओर ले जाना चाहती है; असली चुनौती इसी कट्टरता से निपटने की है।