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तेल का खेल

Mon, 02 Sep 2013 07:48 PM IST
नई दिल्ली
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अर्थव्यवस्था की आज जो हालत हो गई है, उसके लिए वैश्विक गतिविधियों से कहीं अधिक मौजूदा यूपीए सरकार की आर्थिक नीतियां ही जिम्मेदार हैं। असल में यह समझने के लिए अर्थशास्त्र का अध्येता होने की जरूरत नहीं है कि ठप निर्यात और बढ़ते आयात के कारण चालू खाते के घाटे पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता।
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आर्थिक जड़ता के कारण हमारा निर्यात तो बढ़ नहीं रहा, बल्कि आयात का बोझ ही बढ़ता जा रहा है। यों भी हम अपनी पेट्रोलियम जरूरतों के तकरीबन 80 फीसदी के लिए आयात पर ही निर्भर हैं। ऐसे में डॉलर के मुकाबले जिस तेजी से रुपये में गिरावट आई है, उसका असर कच्चे तेल की लागत पर पड़ना ही था। मगर इस बोझ को कम करने का व्यावहारिक और विश्वसनीय उपाय तलाशने में सरकार अब तक नाकाम रही है।

प्रधानमंत्री पहले ही पेट्रोल और डीजल की खपत कम करने का सुझाव दे चुके हैं और अब कुछ इसी तरह की बात पेट्रोलियम मंत्री वीरप्पा मोइली ने भी कही है। हालांकि मोइली इस बात से मुकर जरूर गए, मगर यह कतई व्यावहारिक नहीं है कि पेट्रोल और डीजल पंप रात को बंद कर दिए जाएं।
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मोटे तौर पर यह समझने की जरूरत है कि पेट्रोल और डीजल सिर्फ वाहनों में ही काम नहीं आते, बल्कि अर्थव्यवस्था को चलाने वाले कारक कृषि, खनन, विनिर्माण और बिजली जैसे क्षेत्र तो इसके बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते। जाहिर है, पेट्रो उत्पादों के उपयोग पर कुछ हद तक तो अंकुश लगाया जा सकता है, पर इस पर किसी तरह की कठोर पाबंदी नहीं लगाई जा सकती। पेट्रोलियम मंत्री ने हालांकि ईरान से कच्चे तेल की खरीद बढ़ाए जाने का सुझाव जरूर दिया है, जिससे कुछ हद तक राहत भी मिल सकती है।

मगर अपने आणविक कार्यक्रमों की वजह से प्रतिबंध झेल रहे ईरान से एक सीमा तक ही कच्चा तेल मंगाया जा सकता है। असली जरूरत तो रुपये को मजबूत करने की है, जिसके लिए हर हाल में निर्यात बढ़ाए जाने पर विचार करना होगा। फिर यह नहीं भूलना चाहिए कि सीरिया में सैन्य कार्रवाई को लेकर अमेरिका जिस तरह बेताब नजर आ रहा है, उससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें और बढ़ सकती हैं, जिसकी मार अंततः आम आदमी पर पड़ेगी, जिस पर दो दिन पहले भी सरकार ने कीमतें बढ़ाकर बोझ डाला है।
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