ल्ली के कानून मंत्री जीतेंद्र सिंह तोमर की कथित फर्जी डिग्रियों के मामले में हुई गिरफ्तारी, आम आदमी पार्टी की सरकार और उपराज्यपाल नजीब जंग के बीच अधिकारों को लेकर चल रही लड़ाई की एक और कड़ी है। इसके बावजूद एक ऐसी पार्टी से, जो राजनीतिक स्वच्छता और भ्रष्टाचार मुक्त दिल्ली के वायदे पर सत्ता में आई हो, यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने आपमें ऐसा आदर्श प्रस्तुत करे, जिससे उस पर उंगली न उठाई जा सके।
वास्तव में, बीएससी और एलएलबी की पढ़ाई करने का दावा करने वाले तोमर की डिग्रियों पर योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण जैसे पार्टी से बाहर किए जा चुके नेता पहले सवाल उठे चुके थे। और अब कानून मंत्री के खिलाफ कार्रवाई करने वाली दिल्ली पुलिस का दावा है कि बिहार के तिलका मांझी और उत्तर प्रदेश के राम मनोहर लोहिया विश्वविद्यालयों ने तोमर की डिग्रियों को खारिज किया है। उनकी डिग्रियों पर अंतिम फैसला अदालत को ही करना है, पर इस मामले ने आम आदमी पार्टी की मुसीबतें बढ़ा दी है।
वह यह तर्क देकर बहुत बचाव करने की स्थिति में नहीं है कि दिल्ली पुलिस ने तोमर पर कार्रवाई केंद्र सरकार के कहने पर की है। लेकिन यदि उनकी डिग्रियां वाकई फर्जी हैं, तब तो यह बात गौण हो जाती है कि उन्हें पुलिस ने किस तरह गिरफ्तार किया। आम आदमी पार्टी इसे केजरीवाल सरकार द्वारा सीएनजी घोटाले की जांच करने के आदेश से जोड़कर भी देख रही है।
इसमें दो राय नहीं कि केजरीवाल सरकार के गठन के बाद से लगातार उसका केंद्र सरकार और उपराज्यपाल के साथ टकराव चल रहा है, और स्थितियां इतनी विकट होती जा रही हैं कि उसमें किसी भी निर्वाचित सरकार के लिए काम करना मुश्किल हो सकता है। ऐसा लगता है, मानो मुख्यमंत्री और उपराज्यपाल के बीच शह और मात का खेल चल रहा हो। मुख्यमंत्री एक नियुक्ति करते हैं, उपराज्यपाल उसे खारिज कर नई नियुक्ति कर देते हैं। एक आदेश जारी करता है, दूसरा प्रतिआदेश। राजधानी दिल्ली के लोगों के लिए यह स्थिति कतई अच्छी नहीं कही जा सकती। हैरानी नहीं कि ऐसे में केंद्र सरकार की नीयत पर भी सवाल उठ रहे हैं। लेकिन अच्छा तो यह होता कि तोमर की डिग्रियों पर गंभीर सवाल उठने पर केजरीवाल उन्हें उसी समय मंत्रिमंडल से अलग कर देते, क्योंकि ऐसा नहीं करने से भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी लड़ाई कमजोर होती है।