अफगान राष्ट्रपति हामिद करजई की एक साल में दूसरी बार भारत आने की वजह समझी जा सकती है। अगले साल वहां से न सिर्फ विदेशी सैनिकों का जाना तय है, बल्कि काबुल एक नया राष्ट्रपति भी चुनेगा। करजई चाहते हैं कि भारत जैसे मुल्कों के सहयोग से अफगानिस्तान अपने मजबूत भविष्य का निर्माण करे।
लेकिन कभी अमेरिका की पाकिस्तानपरस्त नीतियों के कारण इसमें रुकावट आती है, तो कभी पाकिस्तान हिंसा फैलाकर वहां अपना वर्चस्व बनाए रखने की मंशा में कामयाब होता रहा है। अब जाते-जाते अमेरिका यह पेच फंसा रहा है कि अगले दस साल तक अफगानिस्तान में कुछ हजार विदेशी सैनिक बने रहेंगे। वैसे इसमें कोई बुराई नहीं है। कम से कम इसी बहाने तालिबान जैसे आतंकी संगठनों पर नियंत्रण बना रहेगा। लेकिन करजई इस पर राजी नहीं हैं।
उनका मानना है कि विदेशी सैनिक आतंकवादियों के बहाने आम लोगों को निशाना बनाते हैं, जिस पर अब अंकुश लगना चाहिए। उनका यह भी कहना है कि इस बारे में फैसला नए राष्ट्रपति करेंगे, वह नहीं। भारत दौरे पर आकर उन्होंने रक्षा सहयोग मांगने के अलावा अफगानी सैनिकों का प्रशिक्षण बढ़ाने की जो गुजारिश की है, उससे पता चलता है कि वह अफगानिस्तान के नवनिर्माण के बारे में गंभीर हैं। भारतीय उद्योगपतियों से जहां उन्होंने अफगानिस्तान में निवेश करने की अपील की है, वहीं मनमोहन सिंह के साथ बातचीत में ईरान के साथ आपसी संबंध बेहतर करने पर भी चर्चा हुई।
राष्ट्रपति के रूप में करजई की चूंकि यह आखिरी पारी है, ऐसे में यह नहीं कह सकते कि इन सबके पीछे उनका कोई स्वार्थ है। लेकिन उनका ताजा रुख पाकिस्तान और अमेरिका, दोनों को नाराज करने वाला है। अगर विदेशी सैनिकों को रखने की शर्त पर अफगानिस्तान राजी नहीं होता, तो उसे पश्चिम की मदद से हाथ धोना पड़ सकता है।
इसी तरह नवाज शरीफ भले काबुल से बेहतर संबंध की बात करें, लेकिन नई दिल्ली से उसकी नजदीकी को इस्लामाबाद शायद ही बर्दाश्त करे। सरताज अजीज कह ही रहे हैं कि यदि दूसरे देश काबुल में दखल न दें, तो पाकिस्तान भी हस्तक्षेप नहीं करेगा। अफगानिस्तान का हिताकांक्षी होने के नाते भारत यही चाहेगा कि हामिद करजई लचीला रुख अपनाएं।