आबादी का बोझ चूंकि शहरों पर लगातार बढ़ रहा है, ऐसे में, हमारे शहरी जीवन को आधुनिकतम, सुव्यवस्थित, बेहतर सुविधाओं से युक्त और पर्यावरण अनुकूल बनाने की दिशा में स्मार्ट सिटी परियोजना सचमुच एक बढ़िया पहल है। अट्ठानबे शहरों का चयन कर इस ओर पहला कदम बढ़ाया भी जा चुका है, जिसमें उत्तर प्रदेश के सर्वाधिक शहर हैं। सच्चाई यह है कि हमारे अधिकांश शहर अनियोजित विकास, सोसाइटियों के साथ झुग्गी-बस्तियों का विस्तार, बुनियादी सुविधाओं का अभाव, ट्रैफिक जाम और कानून-व्यवस्था की कमी जैसी एक-सी समस्याओं से जूझ रहे हैं।
ऐसे में, स्मार्ट सिटी के लिए जल प्रबंधन, स्वच्छ ऊर्जा, कचरे का सही निपटान, बेहतर आवागमन, खुली सोसाइटियां, ई-अस्पताल, ऑनलाइन सेवाएं आदि जो कसौटियां तय की गई हैं, वे वाकई प्रभावित करती हैं। अगर अगले कुछ वर्षों में देश के सौ शहर इन विशेषताओं के आधार पर स्मार्ट शहर बनते हैं, तो दूसरे शहरों को भी इस रास्ते पर ले जाने की संभावना बनेगी।
अलबत्ता स्मार्ट शहरों के जो प्रावधान हैं, वे उम्मीदों के साथ-साथ सवाल भी पैदा करते हैं। मसलन, स्मार्ट शहरों के लिए जितने धन का प्रावधान किया गया है, समस्याओं के अंबार को देखते हुए अव्वल तो वही नाकाफी लगता है। फिर जिस तरह नवी मुंबई, नई दिल्ली एनडीएमसी क्षेत्र और चंडीगढ़ आदि को स्मार्ट सिटी के लिए चुना गया है, उससे स्पष्ट है कि नए विकसित हो रहे शहरों के बजाय जोर पहले से विकसित शहरों को ही स्मार्ट बनाने पर है।
चूंकि इस योजना में राज्यों को केंद्र के बराबर धनराशि खर्च करने के अलावा निवेशकों की तलाश करनी होगी तथा शहरी स्थानीय निकायों को भी बराबर की भागीदारी निभानी होगी, ऐसे में छोटे, पिछड़े या अविकसित शहरों को स्मार्ट बनाने का सपना फिलहाल तो साकार होने से रहा, क्योंकि निवेशक तो संपन्न शहरों को ही वरीयता देंगे। कचरा प्रबंधन से लेकर परिवहन तक निजी क्षेत्र में होने के कारण स्मार्ट शहर महंगे भी होंगे। इसके बावजूद यह परियोजना अगर अगले कुछ दशकों में देश के शहरों का चेहरा बदल पाती है, तो यह वाकई एक बहुत बड़ा बदलाव होगा।