लाल किले के प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज जब दूसरी बार देशवासियों को संबोधित करेंगे, तब यकीनन उनके पास गिनाने के लिए कुछ उपलब्धियां होंगी। स्वतंत्रता दिवस वस्तुतः एक लोकतांत्रिक देश के रूप में हमारी विकास यात्रा के मूल्यांकन का अवसर होता है, और इस लिहाज से देखें, तो हमारा प्रदर्शन बहुत बुरा भी नहीं है। पिछले स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री मोदी ने सभी सरकारी स्कूलों में शौचालय की सुविधा देने का वायदा किया था, जो लगभग पूरा होने की स्थिति में है।
पिछले वर्ष जो जन-धन योजना प्रारंभ की गई थी, उसको आधार बनाकर बीमा और पेंशन योजनाओं की शुरुआत की गई है। चौदहवें वित्त आयोग की सिफारिशें लागू होने के कारण राजस्व में राज्यों की हिस्सेदारी बढ़ने से विकास योजनाओं को गति मिलने की उम्मीद बनी है, पूर्वोत्तर में नगा उग्रवादी गुट एनएससीएन के साथ शांति समझौते का कदम उठाया गया है, तो आतंकवाद के खिलाफ सख्त तेवर दिखाने के साथ पाकिस्तान के साथ बातचीत का रास्ता भी खुला रखा गया है।
तेजी से बदलते भारत की तस्वीर हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों में कन्याओं के प्रति समाज के बदलते रवैये से दिखती है, और वैश्विक परिदृश्य में युवा भारतीयों के वर्चस्व के सुबूतों से भी। गूगल के सीईओ के रूप में सुंदर पिचाई की नियुक्ति इसका नवीनतम उदाहरण है।
करीब एक दर्जन शीर्ष बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सीईओ भारतीय हैं, जिसे देखते हुए टाइम मैगजीन भारत को सीईओ निर्यातक देश के तौर पर रेखांकित कर चुका है! हालांकि स्वतंत्रता दिवस से ठीक पहले संसद का सत्र जिस राजनीतिक कटुता के बीच संपन्न हुआ, उससे न सिर्फ जनप्रतिनिधियों की छवि खराब हुई, बल्कि कई ऐसे कानून बनने से रह गए, जिससे देशवासियों को ही फायदा होता।
इसी तरह स्वच्छ भारत जैसे जरूरी अभियान में भी अभी बहुत काम करने की जरूरत है। स्वतंत्रता दिवस की सार्थकता तो तभी है, जब स्वतंत्रता की गारंटी हर स्तर पर हो, और कतार के आखिरी व्यक्ति की आंखों से आंसू पोछने की कोशिश की जाए।