दमिश्क में पिछले हफ्ते हुए कथित रासायनिक हमले के बाद सीरिया की स्थिति भयावह हो गई है और वहां शांति तथा स्थिरता के प्रयासों को गहरा धक्का लगा है।
वाकई सीरिया आज उस मोड़ पर खड़ा है, जहां से कोई रास्ता जाता दिख नहीं रहा है। गृहयुद्ध से जूझ रहे सीरिया की इस स्थिति के लिए बशर अल असद की सरकार जितनी जिम्मेदार है, उससे कम जवाबदेह अंतरराष्ट्रीय बिरादरी भी नहीं है, जिसने जख्म को नासूर बनने दिया।
वहां बाहरी हस्तक्षेप इतना है कि आम अवाम के पास अपना फैसला करने की गुंजाइश ही नहीं बची है। एक तरफ बशर अल असद सरकार की मनमानियों के बावजूद उसके साथ रूस और चीन जैसे सहयोगी हैं, तो अमेरिका और ब्रिटेन जैसी ताकतें विपक्षी सीरियाई क्रांतिकारियों के राष्ट्रीय गठबंधन को सीरियाई लोगों का वैध प्रतिनिधि मानती हैं और वहां सैन्य कार्रवाई के विकल्प पर गंभीरता से विचार कर रही हैं।
इस स्थिति में यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से कोई समाधान निकल पाएगा। आखिर सीरिया में दो वर्ष पहले संयुक्त राष्ट्र के पूर्व महासचिव कोफी अन्नान की अगुआई में शुरू किया गया प्रयास भी नाकाम हो गया था, क्योंकि उन्हें अंतरराष्ट्रीय बिरादरी से अपेक्षित सहयोग नहीं मिला था।
वास्तव में ट्यूनीशिया, मिस्र और लीबिया में 2011-12 के दौरान जिस अरब क्रांति की शुरुआत हुई थी, उसके प्रभाव में सीरिया में भी लोकतंत्र की बहाली की उम्मीद की गई थी। लेकिन वहां हालात बेकाबू हो गए हैं और सरकार तथा विद्रोहियों के झगड़े में हजारों लोग मारे जा चुके हैं।
इस बीच, वहां संयुक्त राष्ट्र का विशेष दल रासायनिक हथियारों की जांच के लिए पहुंच चुका है, मगर उसे भी निशाना बनाया गया है। इन सबके बावजूद सीरिया में किसी भी तरह की सैन्य कार्रवाई की हड़बड़ी नहीं की जानी चाहिए और दोनों पक्षों के बीच सुलह के प्रयास किए जाने चाहिए।
अच्छा तो यह होता कि सीरियाई सरकार के रूस और ईरान जैसे मित्रों को भरोसे में लेकर उसकी संप्रभुता को ध्यान में रखते हुए कोई साझा प्रयास किया जाता। उम्मीद की जानी चाहिए कि अमेरिका जल्दबाजी में इराक जैसी गलती नहीं करेगा, जहां उसके दावों के बावजूद कभी रासायनिक हथियार बरामद नहीं किए जा सके।