आगामी सात सितंबर को श्रीनगर में होने वाले जुबिन मेहता के संगीत कार्यक्रम का विरोध कर रहे कट्टरवादी दरअसल अपनी कुंठा का ही परिचय दे रहे हैं। अली शाह गिलानी जैसे लोगों ने तो अपने इरादे जाहिर भी कर दिए हैं कि इस कंसर्ट के विरोध के बहाने वे आगामी चुनावों के बहिष्कार की भी अपील करेंगे।
शुरुआत में वे ऐसे कार्यक्रम से कश्मीर का माहौल बिगड़ने की आशंका जता रहे थे। क्या बहाना है! आतंकवादी घटनाओं से कश्मीर का माहौल नहीं बिगड़ता, चुने हुए सरपंचों को डराने और उनकी हत्या करने से माहौल नहीं बिगड़ता, संगीत के कार्यक्रम से माहौल बिगड़ता है!
जब मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि कश्मीरियत संगीत के खिलाफ नहीं है, तब कट्टरवादियों ने अपनी हताशा जाहिर कर दी कि ऐसे अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम जम्मू-कश्मीर में भारतीय शासन को मजबूती देंगे।
गिलानी जैसों को शुक्र मनाना चाहिए कि वे एक ऐसे लोकतंत्र में रह रहे हैं, जहां जब चाहें, तब भारत-विरोधी बातें कह सकते हैं। क्या उन्हें बताना पड़ेगा कि जिस राज्य में वह रहते हैं, वह भारत का अभिन्न अंग है और वहां एक चुनी हुई सरकार है? उनके जैसे लोग यह क्यों भूल जाते हैं कि जम्मू-कश्मीर की अर्थव्यवस्था केंद्र सरकार द्वारा दी जाने वाली विशेष मदद और अनुदान से चलती है!
यह केंद्र की लगातार कोशिशों का ही नतीजा है कि वह राज्य आज विकास की मुख्यधारा में लौटने की ओर है। घाटी में रेल की शुरुआत इसका ताजा उदाहरण है, जिसका लाभ वहां के लोगों को मिल रहा है।
मशहूर संगीतज्ञ जुबिन मेहता के संगीत कार्यक्रम से कश्मीर जहां दुनिया के केंद्र में होगा, वहीं इस कंसर्ट का 104 देशों में सीधे प्रसारण कर प्रसार भारती भी अपनी क्षमता का परिचय देगा।
वस्तुतः कश्मीर में हर उस कदम का समर्थन करना चाहिए, जिससे वहां शांति और स्थिरता को बल मिलता है। जहां तक कट्टरवादियों का सवाल है, तो बहुत पहले ही वे घाटी में अलग-थलग पड़ गए हैं।
चुनाव के बहिष्कार की मांग करने वाले गिलानी की अपील का असर अब खुद उनके इलाके तक में नहीं होता। घाटी में उन जैसे लोगों की संख्या दिनोंदिन कम होती जा रही है, इसके बावजूद सच्चाई को स्वीकार करने का साहस उनमें नहीं है।