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पुरानी दोस्ती को नया रंग

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भारत और रूस की आजमाई हुई दोस्ती समय के साथ कितने रंग बदल चुकी है, इसका आभास रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के हालिया भारत दौरे से मिलता है। यह दौरा न केवल बहुत संक्षिप्त था, बल्कि राजधानी में चल रहे आंदोलन ने भी उनकी यात्रा को कमोबेश फीका कर दिया। इसके बावजूद दोनों देशों के बीच हुए समझौते बहुत कुछ कह जाते हैं।
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इसमें रूस से सुखोई-30 लड़ाकू विमानों के अलावा रात में सैन्य कार्रवाई करने में सक्षम हेलीकॉप्टरों की खरीद का सौदा तो शामिल है ही, निवेश को बढ़ावा देने के लिए संयुक्त संघ गठित करने, विज्ञान व तकनीक के क्षेत्र में पारस्परिक सहयोग बढ़ाने और ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग करने जैसे कदम शामिल हैं। सच यह है कि सोवियत संघ के विघटन के बाद से रक्षा सौदे के मामले में भारत की निर्भरता उस पर कम होती चली गई।

आज भारत सैन्य खरीद के मामले में अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और इस्राइल पर ज्यादा निर्भर है। बल्कि हाल के दौर में कई मामलों में भारत और रूस के बीच विवाद सतह पर उभरे हैं। एडमिरल गोर्शकोव मामले में हुई देरी और उसकी बढ़ती कीमत ने नई दिल्ली को परेशान किया, तो कुडनकुलम परियोजना के विस्तार पर उभरे मतभेद और 2 जी मामले में सिस्तेमा का लाइलेंस रद्द होने से मॉस्को हताश है।
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ऐसे में, पुतिन के संक्षिप्त दौरे के बीच इतने समझौते क्या रूसी दबाव का नतीजा हैं! यह सच है कि हाल के वर्षों में नए दोस्तों के साथ हमारा व्यापार जितना बढ़ा है, रूस के साथ आर्थिक रिश्तों में उतना ही ठंडापन है। बीच में मास्को ने पाकिस्तान से रक्षा संबंध मजबूत करने की कोशिश की, लेकिन इस्लामाबाद चूंकि खरीदारी के बजाय मदद मांगने में ज्यादा यकीन करता है, इसलिए दोनों के रिश्ते उतने प्रगाढ़ नहीं हो पाए।

हमारे लिए रूस बेशक अकेला मददगार नहीं है, लेकिन उसके साथ मजबूत संबंध बनाए रखना जरूरी है, तो सिर्फ भौगोलिक नजदीकी के कारण नहीं, बल्कि ऊर्जा क्षेत्र में रूसी संभावनाएं भी काफी हैं। अफगानिस्तान में अपने हितों की सुरक्षा के लिए भी हमें उसका साथ चाहिए। दूसरी ओर, रूस को भी चाहिए कि वह शीतयुद्धकालीन मानसिकता से बाहर निकलकर भारत के साथ अपने संबंधों को परिभाषित करे।
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