फ्रांस में आर्सेलर मित्तल और मालदीव में जीएमआर का निशाने पर होना भारतीय कारोबार के लिहाज से ही दुर्भाग्यपू्र्ण नहीं है, इनका दोपक्षीय संबंधों पर असर पड़ना भी तय है। मालदीव में कट्टरपंथी वाहीद सरकार के आने के साथ ही भारत के प्रति विद्वेष भाव पैदा हो गया था, जिसका सुबूत जीएमआर का ठेका रद्द करने के रूप में सामने आया है।
जीएमआर कोई मामूली इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनी तो नहीं ही है, माले हवाई अड्डे को नया रूप देने के लिए मालदीव की पिछली नशीद सरकार ने उसे पारदर्शी प्रक्रिया के तहत ठेका दिया था। लेकिन वाहीद की गठबंधन सरकार के कुछ दल इस ठेके को संप्रभुता पर खतरा बताते हुए रद्द करने की मांग कर चुके हैं। यानी ठेका रद्द करने के पीछे ठोस राजनीतिक कारण हैं। अगर वाहीद सरकार की इस आक्रामकता के पीछे चीन की शह हो, तब भी मालदीव जैसे छोटे से देश की निवेश और व्यापार संभावनाओं के लिए यह घातक फैसला है।
खासकर तब, जब भारत उसकी मदद ही करता आया है। जहां तक आर्सेलर का मामला है, तो लक्ष्मी निवास मित्तल ने जब इसका अधिग्रहण किया था, तभी विशेषज्ञों ने इसे घाटे का सौदा बताया था। इस बीच यूरोप और अमेरिका की मंदी ने इस शीर्ष बहुराष्ट्रीय कंपनी को और भी मुसीबत में ला दिया है। नतीजतन फ्रांस के फ्लोरेंज में आर्सेलर मित्तल को अपनी दो भट्ठियां बंद कर देनी पड़ी हैं, जिससे छह सौ से अधिक कामगार बेरोजगार हो गए हैं।
और यही फ्रांस की नई सोशलिस्ट सरकार की नाराजगी की वजह है। वह हर हाल में अपने कामगारों की सामाजिक सुरक्षा चाहती है। लेकिन वह भूल जाती है कि कारोबार सामाजिक सुरक्षा और जनकल्याण के नजरिये से नहीं, बल्कि मुनाफे के तर्क पर चलते हैं।
फिर फ्रांस में आर्सेलर मित्तल के कुल कामगारों की संख्या बीस हजार से ऊपर है; मंदी के इस दौर में सरकार कितने लोगों को सामाजिक सुरक्षा दे पाएगी? ओलांद सरकार की इस समझ के कारण ही फ्रांस की अर्थव्यवस्था ढलान पर है। मंदी से निपटने के लिए सरकोजी ने जर्मन राष्ट्रपति मर्केल के साथ जैसा तालमेल बनाया था, ओलांद उसे पहले ही पटरी से उतार चुके हैं। ऐसे में, आर्थिक मामले में उनका दुराग्रह फ्रांस का ही ज्यादा नुकसान करेगा।