संसद के दोनों सदनों से मंजूरी मिलने के बाद आखिरकार देश को पांच दशक बाद भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए बहुप्रतीक्षित लोकपाल मिल जाएगा। अप्रैल, 2011 में अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल के साझा आंदोलन से लोकपाल के लिए अभियान शुरू हुआ था और आज जब इसे संसद ने पारित किया है, तो अन्ना और अरविंद दो मुहानों पर खड़े हैं!
मगर लोकपाल को अन्ना बनाम अरविंद से आगे जाकर देखने की जरूरत है, क्योंकि भ्रष्टाचार आम आदमी के सामने सबसे बड़ा मुद्दा है। निचले स्तर से लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय तक और सेना से लेकर न्यायपालिका जैसी पवित्र माने जाने वाली संस्थाएं तक भ्रष्टाचार की जद में हैं।
लोकपाल का जो स्वरूप सामने आया है, उसमें पहले से कहीं अधिक कड़ाई और पारदर्शिता बरती गई है। मगर इसमें गलत शिकायत पाए जाने पर सजा और जुर्माने का जो प्रावधान किया गया है, उसे लेकर आम आदमी पार्टी की चिंता वाजिब लगती है। जहां तक सीबीआई की स्वतंत्रता की बात है, तो सर्वोच्च अदालत की कड़ी टिप्पणी के बाद से ही उसे सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने की पहल हो चुकी है।
सीबीआई के अभियोजन निदेशक को लोकपाल के दायरे में लाने का प्रावधान किया गया है, मगर व्यावहारिक रूप से यह स्थिति मामलों के सामने आने के बाद ही पता चल सकेगी। इसके अलावा लोकपाल के सामने आने वाले मामलों को यदि समयबद्ध तरीके से नहीं निपटाया गया, तब तो स्थिति हमारी अदालतों जैसी ही हो जाएगी, जहां आज तीन करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं! राहुल गांधी ने सिटिजन चार्टर सहित कुछ और विधेयकों का जिक्र करते हुए भ्रष्टाचार के खिलाफ इन्हें जरूरी बताया है, मगर सवाल है कि इन्हें पारित करने की प्राथमिक जिम्मेदारी भी तो उनकी पार्टी की सरकार की ही थी।
और इससे कौन इन्कार कर सकता है कि दिल्ली में ‘आप’ को मिली कामयाबी और 2014 के आसन्न चुनावों ने कांग्रेस और भाजपा, दोनों को लोकपाल को पारित करने के लिए मजबूर कर दिया। सुशासन की दिशा में लोकपाल एक महत्वपूर्ण कदम है, मगर जब तक इसके दायरे में निजी क्षेत्र को शामिल नहीं किया जाएगा, भ्रष्टाचार पर कारगर तरीके से अंकुश नहीं लगाया जा सकेगा।