देश के पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में मतदाताओं ने जैसा उत्साह दिखाया है, उसे भारतीय लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत माना जाना चाहिए।
पहले छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान और मिजोरम में पिछले चुनावों की तुलना में अधिक मतदान दर्ज किया गया और अब दिल्ली में जिस तरह सारे रिकॉर्ड ध्वस्त हो गए, उसके लिए आम मतदाता बधाई के पात्र हैं। अमूमन अधिक मतदान को सत्ता विरोध या समर्थन से जोड़कर देखा जाता रहा है, लेकिन इस बार चुनाव आयोग ने लगातार मतदाताओं के लिए जागरूकता अभियान चलाया, यह उसका भी असर है।
अधिक मतदान के पीछे 18 से 22 वर्ष के उन नए युवा मतदाताओं की भी भागीदारी रही है, जिनके लिए वोेट डालने का यह पहला मौका था। वैसे इन चुनावों के नतीजों से यह भी पता चलेगा कि आखिर कितने लोगों ने उस विकल्प का इस्तेमाल किया, जिसमें उनके पास सारे उम्मीदवारों को खारिज करने तक का विकल्प था!
कुछ महीने बाद होने वाले लोकसभा चुनाव की वजह से इन पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों का महत्व बढ़ गया, लिहाजा इनके नतीजों को भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की प्रतिस्पर्धा से भी जोड़कर देखा जाएगा। वास्तव में मोदी और राहुल, दोनों के लिए लोकसभा चुनाव से पहले यह सबसे बड़ी परीक्षा है; भूलना नहीं चाहिए कि इन पांच राज्यों में लोकसभा की 73 सीटें आती हैं।
भाजपा की अंदरूनी राजनीति के लिहाज से मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के चुनाव अहम हैं, क्योंकि यदि इन दोनों राज्यों में वह अपनी सत्ता बचाए रखने में सफल हुई, तो शिवराज सिंह चौहान और रमन सिंह अपने दम पर तीसरी बार सत्ता दिलाने के साथ मोदी के समकक्ष खड़े हो जाएंगे!
महज छह महीने पहले अस्तित्व में आई अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने दिल्ली के संघर्ष को त्रिकोणीय बना दिया और उनका अनुभव उन लोगों के निश्चय ही काम आएगा, जो मुख्यधारा से हटकर विकल्प की राजनीति करना चाहते हैं। बहरहाल, लोकतंत्र के इस उत्सव के सफलतापूर्वक समापन के लिए सुरक्षा बलों का भी आभार जताना चाहिए, जिनकी वजह से छत्तीसगढ़ के धुर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में भी लोगों ने निर्भीकता के साथ अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया।