फ्रांस की व्यंग्य पत्रिका शार्ली एबदो के दफ्तर में हुआ आतंकी हमला एक नए तरह की चुनौती की ओर इशारा कर रहा है। इस हमले में इस चर्चित पत्रिका के शीर्ष चार कार्टूनिस्ट सहित दस पत्रकारों और दो अन्य लोगों की मौत हो गई। किसी एक आतंकी हमले में इतने पत्रकारों के एक साथ मारे जाने की यह पहली घटना है।
1969 से अस्तित्व में आई वामपंथी रुझान की यह पत्रिका इस्लाम सहित विभिन्न धर्मों पर तंज कसती रही है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से वह पैगम्बर मोहम्मद साहब और इस्लामिक प्रतीकों को लेकर बनाए गए कार्टूनों की वजह से इस्लामिक कट्टरपंथियों और आतंकियों के निशाने पर रही है। इस हमले में मारे गए पत्रिका के मुख्य कार्टूनिस्ट और संपादक स्टीफन कार्बोनियर को पहले भी इस्लामिक आतंकियों से धमकी मिलती रही, लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ उन्होंने कोई समझौता नहीं किया। लेकिन यह जानना जरूरी है कि आखिर इस हमले के पीछे कौन लोग हैं और उनके इरादे क्या हैं।
हमले में पहले अल कायदा और उसके बाद इस्लामिक स्टेट (आईएस) का नाम सामने आया है। इस्लामिक स्टेट कट्टरता और आतंक का नया नाम है, जिसने सीरिया और इराक में अपनी समानांतर सत्ता कायम कर ली है। इस हमले के बाद इस्लामिक देश इरान से आई प्रतिक्रिया चिंता का कारण बन सकती है। वहां के मीडिया का एक तबका यह मानता है कि यह हमला फ्रांस द्वारा सीरिया में सशस्त्र विपक्ष का साथ देने और आईएस के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय गठबंधन सेना द्वारा किए गए हवाई हमले के विरोध में किया गया है! धार्मिक कट्टरता को आतंकी मंसूबों से जोड़ने का यह खतरनाक खेल है, जिसका विरोध किया जाना चाहिए। हैरानी नहीं होनी चाहिए कि पश्चिम एशिया का यह क्षेत्र पत्रकारों के लिए सबसे जोखिम वाली जगह बन गया है, जहां इस्लामिक स्टेट के आतंकी पहले भी कई पत्रकारों की हत्या कर चुके हैं।
दरअसल स्वतंत्र विचारों से न लड़ सकने वाले लोग ही कट्टरता का सहारा लेते है। ऐसी कट्टरता का हर जगह विरोध होना चाहिए और साथ ही यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि यह विरोध किसी धर्म के विरुद्ध नहीं, बल्कि हिंसक मानसिकता का हो। अपने साथियों की मौत से गमजदा शार्ली एबदो के पत्रकार और कार्टूनिस्ट अगले बुधवार को पत्रिका का नया अंक लेकर आ रहे हैं। वास्तव में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हुए इस सबसे बड़े आतंकी हमले के पुरजोर विरोध का इससे अच्छा कोई दूसरा तरीका हो भी नहीं सकता।