भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र (इसरो) के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने स्वदेश निर्मित क्रायोजैनिक इंजिन के जरिये जीएसएलवी-डी5 का सफल प्रक्षेपण कर देश को नए साल में एक शानदार तोहफा दिया है।
यह भारत के असैन्य अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिहाज से मील का पत्थर है, जिसे हासिल करने के लिए हमारे वैज्ञानिक विगत दो दशक से संघर्ष कर रहे थे। हालत यह थी कि पिछली सदी में शीत युद्ध का खामियाजा भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम को भी भुगतना पड़ा था, जिसके चलते अमेरिकी दबाव में पहले पूर्व सोवियत संघ और बाद में रूस से क्रायोजैनिक तकनीक हासिल नहीं की जा सकी थी।
इसके बाद पिछले एक दशक के दौरान क्रायोजैनिक तकनीक के उसके दो प्रयोग नाकाम साबित हुए। लेकिन जीएसलवी-डी 5 के प्रक्षेपण के साथ ही भारत अब अमेरिका, रूस, जापान, चीन और फ्रांस के साथ ही उस एलिट क्लब का सदस्य बन गया है, जिसे अंतरिक्ष विज्ञान की महत्वपूर्ण तकनीक का हुनर मालूम है।
जीएसएलवी-डी 5 के जरिये भू-स्थैतिक उपग्रह जीसैट-14 को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया गया है, जिसे संचार के क्षेत्र की बढ़ती मांग और जरूरतों को ध्यान में रखते हुए अहम माना जा रहा है। यह उपग्रह जीसैट-3 का स्थान लेगा और 12 वर्ष तक काम करता रहेगा।
यों भारत ने उपग्रह प्रक्षेपण की तकनीक तो साढ़े तीन दशक पहले हासिल कर ली थी और पीएसएलवी उसके सफलतम प्रक्षेपण यान में से भी है, जिसके 25 में से 23 प्रक्षेपण सफल रहे हैं; मगर भारी उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए क्रायोजैनिक इंजन की जरूरत पड़ती है।
इसके न होने से भारत को अपने संचार और मौसम से संबंधित भारी उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए दूसरे देशों पर निर्भर होना पड़ता था और उसके एवज में अच्छी-खासी कीमत भी अदा करनी पड़ती थी। अमूमन साढ़े तीन टन वजनी उपग्रह के प्रक्षेपण के लिए विदेशी अंतरिक्ष एजेंसियों को पांच सौ करोड़ रूपये देने पड़ते हैं!
मगर क्रायोजैनिक तकनीक के विकसित कर लेने से न केवल उपग्रह प्रक्षेपण की लागत घटेगी, बल्कि इसरो के लिए अंतरिक्ष कारोबार में नई संभावनाएं भी बनेगी। एक अच्छी खबर यह है कि इसरो इस कामयाबी के बाद इसी वर्ष स्वदेशी क्रायोजैनिक तकनीक से जीसैट शृंखला का एक और उपग्रह भेजने की तैयारी कर रहा है।