रेलवे को देश की जीवन रेखा कहा जाता है, लेकिन पिछले कुछ दशकों में रेल बजट राजनीति और क्षेत्रीय तुष्टीकरण का जरिया भी बन गया था। रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने एनडीए सरकार के पहले पूर्ण रेल बजट में लीक से बाहर निकलने का साहस दिखाया है। बजट में किसी नई ट्रेन या नई लाइन और यात्री किराये में किसी तरह के बदलाव की घोषणा न कर उनका जोर ढांचागत बदलाव में अधिक दिखा।
खुद रेल मंत्री रेल बजट को नीतिगत बयान की तरह देखते हैं और उन्होंने रेलवे को निवेश का बड़ा जरिया बनाने के लिए पांच वर्ष का खाका पेश किया है, जिसके तहत साढ़े आठ लाख करोड़ रुपये के निवेश की पेशकश उन्होंने की है। हालांकि अभी यह कहना मुश्किल है कि आखिर वह इस निवेश और लगातार बढ़ते यात्रियों के दबाव के बीच किस तरह का संतुलन स्थापित करेंगे। स्वाभाविक रूप से इस बजट पर उद्योग जगत की प्रतिक्रिया सकारात्मक आई है, जिसे लगता है कि रेलवे भारत की विकास की कहानी में बड़ा भागीदार बन सकता है। असल में माल ढुलाई के क्षेत्र में रेलवे की अहम भूमिका है और इसे बंदरगाहों और हवाई अड्डों से कॉरिडोर के जरिये जोड़ने से विनिर्माण की लागत में कमी में आ सकती है, और इससे प्रधानमंत्री मोदी के महत्वाकांक्षी कार्यक्रम मेक इन इंडिया को गति मिल सकती है। हालांकि माल ढुलाई में की गई वृद्धि का असर सीमेंट, कोयला और खाद्यान्न की ढुलाई पर भी पड़ेगा, जिससे महंगाई में कुछ उछाल आ सकता है।
रेल मंत्री ने यात्रियों की सुविधाओं का ख्याल रखते हुए वाई-फाई से लेकर चलती ट्रेन में सीटों की ताजा स्थिति तक ऑनलाइन देखने की सुविधा देने की घोषणा की है, जो कि देश में मोबाइल इंटरनेट फोन धारकों की बढ़ती संख्या को देखते हुए एक अच्छी पहल कही जा सकती है। मगर इसका दूसरा पहलू यह भी है कि आज भी ट्रेनें देश के करोड़ों ऐसे लोगों के लिए परिवहन के सबसे सस्ते साधन हैं, जिनकी गिनती गरीबी रेखा के नीचे या थोड़ा ही ऊपर होती है। अनारक्षित डिब्बों में सफर करने वाले ऐसे यात्रियों को कोई रियायत या सुविधा बजट में नजर नहीं आई। अलबत्ता पहली बार लगा कि रेलवे यात्रियों को अपना ग्राहक मानता है और उसकी सेवा के लिए वह तैयार है, बशर्ते कि वे उसकी कीमत देने को तैयार हों।