नरेंद्र मोदी को मिशन-2014 की कमान सौंपने के अगले ही दिन भाजपा को जिस तरह से अपने वरिष्ठतम नेता लालकृष्ण आडवाणी को मनाने के लिए जुटना पड़ा है, उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि पार्टी गहरे संक्रमण के दौर से गुजर रही है।
होना तो यह चाहिए था कि गोवा कार्यकारिणी के बाद पार्टी अपना अगला राजनीतिक कार्यक्रम आगे बढ़ाती और खुद को यूपीए तथा कांग्रेस के विकल्प के तौर पर पेश करती।
मगर वह अपने आप में ही उलझती जा रही है। वास्तव में आडवाणी ने पार्टी के तीन शीर्ष फोरम से इस्तीफा देकर न केवल भाजपा, बल्कि राजग को भी संकट में डाल दिया है।
वह कदाचित यह स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि भाजपा में उनका समय बीत चुका है और अब वह जो कुछ कर रहे हैं, उससे उनकी व्यक्तिगत छवि भी धूमिल हो रही है।
उन्होंने भले ही पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को भेजे पत्र में पार्टी के मौजूदा तौर-तरीके से तालमेल नहीं बिठा पाने की बात की है और बिना नाम लिए ही पार्टी के नेताओं पर अपना निजी एजेंडा आगे करने का आरोप जड़ा है।
जबकि यह सब जानते हैं कि उनका निशाना किस ओर है। वास्तव में यह उनका दोहरा मापदंड ही है, क्योंकि उनकी नाराजगी की असली वजह कहीं न कहीं उनकी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से भी जुड़ी हुई है।
फिर वह क्यों भूल रहे हैं कि पार्टी ने पिछला चुनाव तो उन्हीं के नेतृत्व में लड़ा था? मगर वह कोई करिश्मा दिखा नहीं पाए, जबकि वाजपेयी के अस्वस्थ होने के बाद तो वही पार्टी के शीर्षस्थ नेता रह गए थे।
वह यदि आज भी अपनी भूमिका की तलाश कर रहे हैं, तो निश्चय ही यह उनकी जिजीविषा है, मगर वह स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि पार्टी में उनकी जरूरत अब एक मार्गदर्शक के रूप में रह गई है।
असल में उन्हें मोदी से भी तब तक कोई परेशानी नहीं थी, जब तक कि वह गुजरात तक सीमित थे। दिलचस्प यह है कि आज आडवाणी में धर्मनिरपेक्ष छवि देख रहे लोग यह भूल जाते हैं कि यह आडवाणी ही थे, जिन्होंने भाजपा को अयोध्या आंदोलन के जरिये सत्ता की दहलीज तक पहुंचाया था।
खुद भाजपा का यह ‘अनथक यात्री’ न तो समय की नब्ज पकड़ पा रहा है और न ही सियासत का रुख भांप पा रहा है। इसलिए उनकी हताशा से भरी बेताबी मौजूदा मंजर का कारण बन गई है।