सर्वोच्च अदालत की एक पीठ ने बलात्कार के एक मामले में सुनवाई करते हुए पीड़िता और बलात्कार के आरोपी के बीच किसी भी तरह के समझौते को स्त्री की गरिमा के खिलाफ बताया है और स्पष्ट किया है कि बलात्कार या बलात्कार के प्रयास के मामलों में किसी भी स्थिति में समझौते की अवधारणा के बारे में सोचा ही नहीं जा सकता।
मद्रास हाई कोर्ट के एक जज द्वारा बलात्कार के एक आरोपी को एक विवादास्पद फैसले में अंतरिम जमानत दिए जाने की पृष्ठभूमि में आए सर्वोच्च अदालत के इस आदेश ने बलात्कार के मामलों से जुड़ी ग्रंथियों को न केवल दूर किया है, बल्कि निचली अदालतों को भी राह दिखाई है। वास्तव में बलात्कार किसी स्त्री के साथ किया जाने वाला सबसे जघन्य अपराध है, क्योंकि इससे होने वाले नुकसान की भरपाई कभी नहीं हो सकती।
खासतौर से जब पीड़िता गरीब और नाबालिग हो, तो स्थिति और भी भयावह हो जाती है। दरअसल तमिलनाडु का मामला कुछ इसी तरह का था, जहां एक अनाथ नाबालिग गरीब किशोरी के साथ बलात्कार हुआ और फिर उसने एक बच्ची को जन्म दिया। जज ने आरोपी के सामने यह विकल्प रखा कि वह पीड़िता से सुलह कर उसके साथ विवाह कर ले! सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि ऐसी कोई भी पेशकश आरोपी द्वारा चालाकी से दबाव बनाए जाने की कोशिश के अलावा कुछ नहीं है।
वहीं मध्य प्रदेश के जिस मामले पर सर्वोच्च अदालत ने यह आदेश दिया, उसमें तो हाई कोर्ट के फैसले में एक बच्ची के साथ हुए दुष्कर्म के आरोप को यौन हमले में बदल दिया गया, जिससे आरोपी को मिलने वाली सात वर्ष की सजा एक वर्ष रह गई थी। हैरानी की बात है कि निर्भया कांड के बाद बलात्कार के मामलों को लेकर आई सजगता के बावजूद स्थिति नहीं बदली है।
ग्रामीण क्षेत्रों में तो स्थिति और भी भयावह है, जहां बलात्कार पीड़िता को सामाजिक बहिष्कार जैसी स्थिति तक का सामना करना पड़ता है। ऐसे में तमिलनाडु की किशोरवय में दुष्कर्म के कारण मां बन जाने वाली उस लड़की के साहस की सराहना की जानी चाहिए, जिसने आरोपी के साथ किसी भी तरह के समझौते से इनकार कर दिया। वास्तव में बलात्कार के मामले में यह सुनिश्चित किया जाना जरूरी है कि आरोपी कानूनी या सामाजिक ढिलाई का किसी भी तरह से फायदा न उठा सके।