मंत्रिमंडल में बदलाव को लेकर उम्मीद लगाए बैठे लोगों की हताशा समझी जा सकती है। साफ है कि लोकसभा चुनाव से पहले महंगाई और भ्रष्टाचार के कारण आम जनता के निशाने पर आने के बावजूद सरकार में नए चेहरों को लाने और कुछ पुराने लोगों को बाहर या महत्वहीन करने के पीछे सिद्धांत के बजाय सुविधाओं की राजनीति हावी रही है। यही कारण है कि उस आंध्र प्रदेश से सर्वाधिक लोगों को मंत्री पद का तोहफा दिया गया है, जहां विधानसभा चुनाव भी होने हैं, लेकिन स्वतंत्र तेलंगाना के मुद्दे और जगन मोहन रेड्डी के असर के कारण वहां कांग्रेस के लिए विकट चुनौती है।
राज्य के वरिष्ठ कांग्रेसियों को दरकिनार कर पृथक तेलंगाना के विरोधी नवागंतुक पी बलराम नायक को मंत्री पद देना ही बहुत कुछ कह जाता है। इसी तरह पश्चिम बंगाल में ममता के आलोचक अधीर रंजन चौधुरी और दीपा दासमुंशी समेत तीन लोगों को मंत्री बनाकर तृणमूल को सख्त संदेश देने की कोशिश तो की ही गई है, पंचायत चुनाव से पहले पार्टी में जान फूंकने का लक्ष्य भी है।
यह सही है कि राहुल गांधी के मंत्रिमंडल में शामिल न होने के बावजूद अजय माकन, ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट जैसे उनके निकटस्थों को प्रोन्नत किया गया है, और इसमें कोई हर्ज भी नहीं है, लेकिन एफडीआई-विरोधी हवा में आर्थिक सुधार के समर्थक आनंद शर्मा का मंत्रालय बरकरार रहना बताता है कि मनमोहन सिंह की भी खूब चली है। यही क्यों, कमलनाथ को संसदीय कार्य मंत्री की अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपकर परिवार के प्रति निष्ठा को भी पुरस्कृत किया गया है।
लेकिन विवादास्पद सुबोधकांत सहाय से इस्तीफा लेकर अगर सख्त संदेश देने की कोशिश की गई है, तो उतने ही विवादों में घिरे सलमान खुर्शीद को विदेश मंत्रालय में प्रोन्नत कर सरकार क्या बताना चाहती है? शशि थरूर की वापसी के पीछे क्या औचित्य है, यह भी सरकार को बताना चाहिए, क्योंकि अगर वह पहले विवादास्पद थे, तो अब साफ कैसे हो गए? एक उद्योग घराने के दबाव पर एस जयपाल रेड्डी को पेट्रोलियम मंत्रालय से जिस तरह हटाया गया है, वह सबसे स्तब्ध करने वाला फैसला है। जाहिर है, जब मंत्रियों को लाने, हटाने और प्रोन्नत करने के पीछे कोई सुस्पष्ट सोच नहीं है, तो इस बदलाव से भला कितनी उम्मीद करें!