केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने से पहले ही बिहार में राजनीतिक घटनाक्रम जिस तेजी के साथ बदल रहे हैं, वे एक अनिश्चित भविष्य का ही संकेत दे रहे हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने लोकसभा चुनाव में पार्टी के खराब प्रदर्शन के कारण नतीजा आने के एक दिन बाद इस्तीफा दिया। तथ्य यह है कि विधानसभा की पांच सीटों पर हुए उपचुनाव में भी जदयू को मात्र एक सीट मिली है।
दरअसल भाजपा से रिश्ता तोड़ने के अपने फैसले के कारण लंबे समय से वह पार्टी के भीतर आलोचना के घेरे में हैं। बताया जाता है कि पार्टी का एक हिस्सा भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने का इच्छुक है। सरकार चलाने के लिए जिन निर्दलीय विधायकों का उन्होंने समर्थन लिया, वे भी मंत्री पद न मिलने के कारण उनसे क्षुब्ध थे। तिस पर पार्टी अध्यक्ष शरद यादव ने हाल में एकाधिक बार अपनी टिप्पणियों से जताया कि वह नीतीश से खुश नहीं हैं।
तमाम नाराज लोगों से निपटने के लिए ही उन्होंने इस्तीफे का ब्रह्मास्त्र चला, जो कारगर भी साबित हुआ, क्योंकि अब पार्टी के भीतर से नीतीश के पक्ष में आवाज सुनाई पड़ने लगी है। कल शाम इस्तीफा वापस लेने का उनका संकेत भी बताता है कि वह नैतिक आग्रह से अधिक एक रणनीतिक कदम ही था। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के खिलाफ नैतिक फैसला लेकर नीतीश ने ऊपरी तौर पर तो सिद्धांतवादी बनने का परिचय दिया, पर अपनी सरकार बचाने के लिए अपने विरोधियों से हाथ मिलाने का उनका फैसला कितना उचित है, यह कौन तय करेगा? लोकसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस और राजद के खिलाफ उम्मीदवार खड़े किए। लेकिन उसी कांग्रेस के समर्थन से उनकी सरकार चल रही है। और अब सांप्रदायिक शक्तियों से मुकाबला करने के लिए वह राजद को साथ लेने की बात कर रहे हैं!
हालांकि मोदी लहर पर सवार भाजपा बिहार में अपनी सरकार बनाने की कोशिश में जिस तरह लगी है, वह भी देखने लायक है। जब डेढ़ साल बाद राज्य में विधानसभा चुनाव होने हैं, तब वह इतनी जल्दबाजी क्यों कर रही है? लेकिन नीतीश कुमार के लिए भी उचित यही होगा कि वह अपना घर ठीक करें और विपक्ष के तमाम आरोपों को बेबुनियाद साबित करें। बिहार में राजनीतिक अस्थिरता अभी किसी के हक में नहीं है।