दहेज विरोधी कानून उन चुनींदा कानूनों में से एक है, जिसका सर्वाधिक दुरुपयोग किया गया है। सर्वोच्च अदालत ने इसका संज्ञान लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी विसंगति को ही दूर किया है। इसमें दो राय नहीं कि दहेज का मामला बेहद संवेदनशील है और दहेज प्रताड़ना से संबंधित संज्ञेय और गैरजमानती कानून के बावजूद ऐसे मामले कम नहीं हो रहे हैं। लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी उतना ही गंभीर है, कि इसकी आड़ में अक्सर पति और ससुराल वालों को फंसा दिया जाता है, जिसकी वजह से बरसों-बरस उन्हें जेल में रहना पड़ता है।
सर्वोच्च अदालत की दो सदस्यीय बेंच ने इस कानून के दुरुपयोग पर चिंता जताते हुए सभी राज्य सरकारों को निर्देश दिए हैं कि ऐसे मामलों में पुलिस भारतीय दंड विधान की धारा 498 ए के तहत गिरफ्तारी से पहले पूरी तरह आश्वस्त हो जाए। असल में दहेज उत्पीड़न से संबंधित धारा 498 ए के तहत दर्ज होने वाले मामलों में पुलिस पर भी गिरफ्तारी का तुरंत दबाव होता है। मगर सर्वोच्च अदालत ने कानून के व्यापक दायरे को रेखांकित कर निर्देश दिए हैं कि ऐसे मामलों में पहले धारा 41 में प्रदत्त मानदंडों के आधार पर आश्वस्त होने के बाद ही कोई कार्रवाई की जाए।
यही नहीं, ऐसे मामलों की न्यायिक समीक्षा का निर्देश देकर सर्वोच्च अदालत ने न्याय के फलक को और बड़ा किया है। वास्तव में दहेज विरोधी इस कानून के दुरुपयोग का हाल यह है कि पुलिस 93 फीसदी मामलों में तो आरोपपत्र दाखिल कर पाती है, लेकिन सिर्फ 15 फीसदी मामलों में ही सजा हो पाती है और बाकी के मामलों में आरोपी बरी हो जाते हैं!
दहेज यदि एक सामाजिक बुराई है, तो बदलते समाज की सच्चाइयों को भी स्वीकार करने की जरूरत है। सामाजिक दबाव, जीवन शैली में बदलाव और आर्थिक समृद्धि की चाहत ने पति-पत्नी के रिश्तों को भी बदला है, जिसकी परिणति दहेज के झूठे मामलों के रूप में भी दिखाई देती है।
सर्वोच्च अदालत का यह फैसला साहसिक तो है ही, लेकिन इसने एक बड़ी बहस को भी जन्म दिया है, जैसा कि माकपा नेता बृंदा करात दहेज के बढ़ते मामलों का हवाला देकर इस कदम को अनुचित बता रही हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि देश में हर वर्ष दहेज प्रताड़ना की वजह से 8,000 मौतें होती हैं। जाहिर है, दहेज के खिलाफ लड़ाई सिर्फ कानून से नहीं लड़ी जा सकती, इसके लिए व्यापक सामाजिक बदलाव की भी जरूरत है।