तीन दशक पहले शायद वह श्रीनगर में नौंवी कक्षा रही होगी, अंग्रेजी के अध्यापक श्री दिवाकर कालाजी पढ़ाते-पढ़ाते कहने लगे तुममें किस-किस ने डोसा खाया है। एक भी हाथ ऊपर नहीं उठा। तीस-पैंतीस बच्चों की क्लास में तब कोई ऐसा नहीं था जिसने दोसा खाया हो। फिर वो बताने लगे कि डालमिया धर्मशाला की जो नई कैंटीन खुली है, वहां दोसा मिलता है। सात रुपए में। दोसे के स्वाद और उसके बारे में उन्होंने कुछ इस तरह बताया कि दोसा खाने की इच्छा प्रबल हो गई। थोड़ा इस बात का ग्लैमर कि साउथ इंडियन खाना है। साथ में एक नई चीज को खाने का अहसास भी मन में था। सात रुपए तब हमारे लिए अच्छी खासी रकम थी। लेकिन उसकी व्यवस्था करके अगले दो दिन मैं उस रेस्टोरेंट में था।
यूं तब दिल्ली, लखनऊ, इलाहबाद जैसे बड़े शहर देख घूम लिए थे। लेकिन दोसा नहीं खाया था। संयोग भी नहीं बना था। शादी-विवाह में तब पनीर पुलाव और गाजर हलवा तो बनने लगा था लेकिन दोसे का रिवाज नहीं था। इसलिए दोसे का स्वाद हमसे वंचित ही रहा। मन में एक खुशी थी कि आज दोसा खाना है। तब तक हम दोसा और उसके साथ दी जाने वाली सामग्री से बिल्कुल अंजान थे। यह भी पता नहीं था कि चाकू कांटा भी साथ में होगा। दोसे को लेकर जो छवि थी वह किसी आलू की टिकिया, या समोसा जैसी चीज को लेकर थी। थोड़ी देर में वेटर बड़ी सी थाली में जो चीज लेकर आया उससे मन में डर लगा। दोसा को लेकर आलू की टिकिया जैसी कल्पना लेकिन ये तो इतना बड़ा थाल न जाने किस चीज का ले आया। इसकी तो कीमत भी चालीस रुपए से कम नहीं होगी। मैंने रेस्त्रा वाले से डरकर कहा, भाई साहब मैंने नहीं मंगाया। उसका कहना था अभी तो तुमने दोसा लाने के लिए कहा। मैंने साफ कह दिया कि मेरे पास तो दस रुपए ही हैं। उसने कहा कि क्या हुआ ये तो सात रुपए का है। मुझे कुछ राहत सी महसूस हुई। पर विश्वास नहीं हुआ। ये सात रुपए का इतना बड़ा होता है दोसा। इतनी देर में रेस्त्रा का मालिक समझ गया था कि दोसा का प्रथम परिचय से यह चौंक रहा है। उसने एक साहसिक फैसला किया, तुमसे एक रुपए भी नहीं लूंगा आराम से खाओ मेरी तरफ से। मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था। ये मुझे फ्री में क्यों खिला रहे हैं। मैंने पूछा आप पैसे क्यों नहीं ले रहे। उन्होंने कहा कि दोसा यहा के लिए नई चीज है। तुम इसे खाने के लिए जिस शौक से आए, उसमें तुमसे पैसा लेने का मन नहीं करता। समस्या आगे भी थी। दोसे की थाल आई उसमें चटनी सांभर भी आया। लेकिन समस्या तो चाकू कांटे के साथ खाने की थी। अब यह ट्रेनिंग भी तो नई दुकान से ही मिलनी थी। वो मेरी इस दिक्कत को भी समझ सके। मुझे दोसे को पीस करना सिखाया फिर बताया कि कैसे कांटे के साथ खाना है। हालांकि एक बार में यह सीखना संभव नहीं था। लेकिन उस दुकान से जब बाहर आया तो स्कूल के साथियों को सुनाने के लिए एक अनुभव मेरे पास था। अपने अंग्रेजी के अध्यापक को भी बताया कि कैसे फ्री में दोसा खाकर आया। दोसा या किसी भी दक्षिण भारतीय फूड से यह पहला परिचय था। खाते हुए अच्छा लगा था। इसलिए भी कि दोसे के साथ आलू की सब्जी मिक्स होना कहीं न कहीं अपने उत्तर भारत की रसोई से जुड़ाव महसूस करा रहा था। तब जो दौसा हैरत से देखा जा रहा था वह अब केदारनाथ और यमुनोत्री के रास्ते में भी दुकानों पर मिल जाता है। ऐसे रेस्त्रा होटल कम होंगे जो कहें कि उनके यहां दोसा उपलब्ध नहीं है। खाने को पूरी नहीं मिलेगी चलेगा, परांठा भी नहीं ब्रेड भी नहीं लेकिन चाउमिन मैगी के साथ दोसा तो मिल ही जाता है। किसी भी कस्बे में हों किसी भी इलाके में कुछ चल फिर रे तो दोसे की दुकान आपको नजर आ ही जाएगी। या फिर सड़क पर ठेलियों में दोसा बनाते लोग मिल ही जाएंगे। यही दोसा अब उत्तर भारत में नया नहीं। बेशक दक्षिण भारत के आम घरों या दुकानों में मिलने वाले दोसे से अलग इसका टेस्ट और आकार है। कितना भी कहे लेकिन दोसे को दक्षिण भारत के किसी रेस्त्रा में खाने का जो आनंद महसूस होता है वह उत्तर भारत में नहीं। उत्तर भारत में यह कुछ न कुछ बदला हुआ लगता है। कितनी भी महंगी और चर्चित दुकान में जाएं लेकिन दक्षिण भारत के घरों में मिलने वाले दोसे, सांबर चटनी का कुछ अलग ही स्वाद पाएंगे। फिर उत्तर भारतीयों ने इस पर अपना उत्तर भारतीय रंग चढ़ाया। उसमें दाल की मात्रा कम की। दोसे के अंदर पनीर ही नहीं कहीं कहीं तो समोसा भी भर दिया। छोटे कस्बों में सांबर उसी हालत में मिलता रहा जिस तरह महाराष्ट्र की पाव भाजी के नाम पर उत्तर भारत में पाव भाजी मिलती है। लेकिन इतना कह सकते हैं कि दोसा उत्तर भारत में इन तीस सालों में खूब चल पड़ा। शादी विवाह में अब दोसा आम खानपान की तरह है। मध्यम वर्ग की आम शादी या किसी फंक्शन में दोसा का एक स्टाल आपको मिल ही जाएगा। यहां तक कि कुछ खास ब्रांड फूड वालों ने डोसे की वैराइटी तक निकाली है। यह दोसा भी कई रंगा आकार में हैं। मसाला दोसा, सामान्य दोसा, पनीर दोसा, दोसे की कई वैराइटी।
दोसे के अर्थशास्त्र भी उत्तर भारत और दक्षिण भारत में अलग अलग होगा। कह सकते हैं कि दोसा बहुत तेजी से आम उत्तर भारतीय जीवन में आया। यहां तक कि दोसा पहले उत्तर भारतीय रसोई में शौकिया आया, अब वही दोसा सामान्य भोजन की तरह हो गया। बाजारों में दोसा बनाने के छोटे तवे इसे बनाने में सुलभ रहे। साथ ही दोसा के लिए चावल दाल आदि पीस न सके तो उसके बने बनाए पेस्ट मिलने लगे। कठिन सा लगने वाला दोसा इतना सरल मान लिया कि सुबह के नाश्ते में भी तैयार होने लगा। स्वाद में अतंर होगा लेकिन दोसा जिस तरह भी मिला लोगों ने पसंद कर लिया। लोग इसे बनाने में अपने लायक पारंगत भी हो गए।
दोसे पर रोचक चर्चा केरल में इंजीनियरिंग की एक छात्रा के सवाल से शुरू हुई। उसने रिर्जव बैंक के गर्वनर रघुराम राजन से पूछा कि देश का केंद्रीय बैंक महंगाई पर नियंत्रण की बात कर रहा है लेकिन इसके बावजूद दोसा की कीमत कम क्यों नहीं हो रही। दोसा पच्चीस रुपए से शुरू होकर 140 रुपए तक पहुंच जाता है। इसी को रेखांकित करते हुए उस छात्रा ने रिर्जव बैंक के गर्वनर से यह जानना चाहा कि अच्छी प्रोद्योगिकी और बाजार के बावजूद इसकी कीमत क्यों नहीं गिरती। उन्होंने सका जवाब दिया कि दोसा बनाने की अच्छी तकनीक नहीं आई। साथ ही केरल में दोसा बनाने के लिए श्रम शक्ति महंगी है। इसे इस रूप में भी देखा जा सकता है कि उत्पादन के जिन क्षेत्रों में हम प्रोद्योगिकी को नहीं अपना सके वहां लागत बढ़ती ही रही। इसके साथ ही कुशल श्रम का मिलना भी चुनौती रही है। श्रम उपलब्ध है लेकिन कुशल श्रम का मिलना कठिन होता है। दोसे के जिस तकनीक की बदलाव पर रघुराम राजन ने जोर दिया है वह केवल उत्पादन की मात्रा पर जोर देता है। जबकि खानपान की मुख्य तत्व स्वाद भी है। इसलिए तंदूर ने भले ही चूल्हे को पीछे कर दिया हो लेकिन उसमें चूल्हे का स्वाद नहीं मिल पाया। सामान्य चाय बनाते हुए भी देखा गया कि लकड़ी के जलाने पर बनी चाय की सुगंध गैस हीटर में नहीं मिल पाती। कूटे गरम मसाले जो स्वाद छोड़ते हैं वह मिस्की नहीं। लेकिन अर्थशास्त्र स्वाद के इस पहलू के बजाय मात्रा और लाभ पर जोर देता आया है। इसलिए रिजर्व बैंक के गर्वनर ने भी दोसा के उस स्वाद के बजाय उसे अर्थशास्त्र से समझना चाहा है कि वह कैसे लाभदायक बने। कैसे लोगों के लिए सस्ता हो सके। जाहिर है तकनीक, प्रोद्यौगिकी सस्ता श्रम और बाजार एक दोसे को सस्ता कर सकते हैं। फिर दोसे की बनावट में भी फर्क है। इसके अर्थशास्त्र को समझने के लिए यह भी जानना होगा कि किस क्षेत्र में डोसे को बनाने के लिए क्या उपलब्धता है। किस क्षेत्र में कौन सी दाल तेल उपयोगी होगा। फिलहाल इतना तय है कि दोसा अब दक्षिण भारत में ही नहीं पूरे भारत के जीवन में है। संभव है कि आगे इसमें कुछ और बदलाव हो। कुछ आकार में भी फर्क हो। आइए, फिलहाल तो एक दोसा खाएं।