जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ क्षेत्र में भड़की हिंसा पर यदि जल्द काबू नहीं पाया गया, तो इसके नतीजे खतरनाक हो सकते हैं। इसके लिए सबसे पहली जरूरत है कि दोनों समुदायों में परस्पर विश्वास बहाली के प्रयास किए जाएं और ऐसे लोगों के खिलाफ सख्ती बरती जाए, जो इस स्थिति से फायदा उठाकर राज्य में अस्थिरता पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं।
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला चाहे लाख दावे करें, लेकिन यह सच है कि उनकी सरकार स्थिति को संभालने में नाकाम साबित हुई है। इसके बावजूद चूंकि कानून व्यवस्था राज्य का मामला है, इसलिए उन्हें सहयोग किया जाना चाहिए। ऐसे हालात में उन्होंने यदि लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता अरुण जेटली और जम्मू-कश्मीर विधानसभा में विपक्ष की नेता महबूबा मुफ्ती को वहां जाने से रोका, तो इसे बहुत तूल नहीं दिया जाना चाहिए। यह बहुत नाजुक मामला है और थोड़ी-सी भी चूक हालात को 1990 के दौर में ले जा सकती है, जिसने इस खूबसूरत सूबे को आतंकवाद और अलगाववाद के अंधे दौर में धकेल दिया।
किश्तवाड़ में भड़की हिंसा में मारे लोगों में मुस्लिम और हिंदू, दोनों हैं और यह जांच से ही पता चलेगा कि यह साजिश किसने रची। यह घटना ऐसे समय हुई है, जब पुंछ सेक्टर में पाकिस्तान लगातार सीमा का उल्लंघन कर भड़काने वाली कार्रवाई कर रहा है। यह समझने की जरूरत है कि ऐसी घटनाओं से अलगाववादियों के हौसले बुलंद होते हैं।
पांच जवानों की हत्या के मामले में रक्षा मंत्री ए के एंटनी के पाकिस्तानी सेना की संलिप्तता स्वीकार किए जाने के बाद संसद ने जिस तरह से एकजुटता का परिचय दिया था, इस मामले में भी वैसी ही एकजुटता दिखाने की जरूरत है। राजनीति में उलझने के बजाय विभिन्न पार्टियों के सांसदों का दल किश्तवाड़ भेजकर सद्भावना का माहौल बनाया जा सकता है, ताकि वहां लोगों में भरोसा कायम हो। असल में ऐसे किसी भी प्रयास के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाने की जरूरत है।
तमाम दलों को यह नहीं भूलना चाहिए कि तनाव की कोई भी घटना आम लोगों की रोजी-रोटी पर असर डालती है। पर्यटन जम्मू-कश्मीर की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और ऐसी घटनाओं से उस पर प्रतिकूल असर पड़ता है, जिसका खामियाजा मुसलमानों और हिंदुओं, दोनों को उठाना पड़ता है।