आम आदमी पार्टी के नेता कुमार विश्वास ने विरोधों और बहिष्कारों के बीच राहुल गांधी के लोकसभा क्षेत्र अमेठी में जिस तरह पहली जनसभा की, वह ढर्रे की राजनीति से न सिर्फ अलग है, बल्कि नएपन की उम्मीद भी जगाती है। अब तक मंचीय कवि के रूप में चर्चित कुमार विश्वास के भाषण में चमक तो थी ही, व्यंग्य भी था और आदतन तुकबंदी भी थी।
आप की इस पहल का अमेठी के चुनावी नतीजे पर क्या असर पड़ेगा, यह तो नहीं कह सकते, पर उसने गांधी परिवार के गढ़ में आकर चुनौती देने का जो साहस दिखाया है, वह प्रशंसनीय है। यह विडंबना ही है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में किसी अमेठी, किसी रायबरेली या किसी कन्नौज का भाग्य किसी खास राजनीतिक परिवार से इस कदर नत्थी हो गया है कि उसके उत्थान-पतन को उनसे जोड़कर देखा जाने लगा है। आप चूंकि इस यथास्थितिवाद को खत्म करने की बात कह रही है, इसीलिए उससे कमोबेश उम्मीद बनती है। और यह उसकी बढ़ती लोकप्रियता ही है, जिसे कई स्थापित राजनीतिक पार्टियां अपने लिए खतरा मान रही हैं।
लेकिन कई मोर्चे पर आप ने जिस किस्म की अपरिपक्वता का परिचय दिया है, उसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती। मसलन, दिल्ली में अरविंद केजरीवाल सरकार के पहले जनता दरबार में जिस तरह अफरातफरी फैली, उसे हल्के में कतई नहीं लिया जा सकता। जितने लोगों के आने का अनुमान लगाया गया था, जनता दरबार में आए लोगों की संख्या उससे कई गुना अधिक थी। इतनी भारी भीड़ से निपटने की तैयारी तो नहीं ही थी, उनकी शिकायतों को मुख्यमंत्री के सामने रखने की कोई व्यवस्था भी नहीं थी, नतीजतन अफरातफरी मच गई, जिससे मुख्यमंत्री को वहां से उठकर जाना पड़ा। इससे कुछ दिन पहले प्रशांत भूषण की जम्मू-कश्मीर पर टिप्पणी से भी विवाद पैदा हुआ था।
दरअसल राष्ट्रीय राजनीति को बदलने का संकल्प लेने वाली पार्टी को भ्रष्टाचार के अलावा दूसरे ज्वलंत मुद्दों पर भी अपने विचार रखने पड़ेंगे। जिस राजनीतिक पार्टी ने अपनी अलग सोच, संवेदना और पारदर्शिता का परिचय देकर थोड़े ही समय में अपनी व्यापक पहचान बनाई है, उसे लोकप्रियतावादी राजनीति और विवाद, दोनों से बचना होगा।