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पेट्रोल के रास्ते पर डीजल!

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बीते दिसंबर में मुद्रास्फीति में आई मामूली गिरावट से महंगाई घटने की जो थोड़ी-बहुत उम्मीद बनी थी, डीजल के आंशिक विनियंत्रण के सरकारी फैसले से वह खत्म हो गई है। सरकार विनियंत्रण शब्द से परहेज कर रही है, लेकिन सरकारी तेल कंपनियों को बीच-बीच में इसकी कीमत बढ़ाने का अधिकार देने को और क्या कहेंगे! यह ठीक है कि विजय केलकर पैनल ने डीजल की कीमत में चार रुपये प्रति लीटर बढ़ोतरी की अनुशंसा की थी। लेकिन उसने तो रसोई गैस में भी पचास रुपये प्रति सिलेंडर बढ़ोतरी की सिफारिश की थी।
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सरकार अगर सब्सिडी के बढ़ते बोझ को सचमुच कम करना चाहती है, तो उसे रसोई गैस की कीमत भी बढ़ानी चाहिए थी, क्योंकि प्रति सिलेंडर दी जाने वाली सब्सिडी प्रति लीटर डीजल की सब्सिडी से कहीं ज्यादा है। लेकिन डीजल पर सख्त रुख अपनाने वाली सरकार रसोई गैस पर नरम दिख रही है। उसने सब्सिडी वाले सिलेंडरों की संख्या छह से बढ़ाकर नौ करने का फैसला किया है! साफ है कि अर्थव्यवस्था पर असर डालने वाला सरकार का यह फैसला राजनीतिक ज्यादा है, जिसे आगामी लोकसभा चुनाव से भी जोड़कर देखा जा सकता है।

उसने मध्यवर्ग को राहत देते हुए खेती-किसानी महंगा करने का संदेश भी दिया है। डीजल पर सब्सिडी जारी रखने का तर्क यह इसलिए दिया जाता है कि इसका इस्तेमाल खेती में ज्यादा होता है। अब डीजल महंगा होगा, तो खाद्यान्न तो महंगे होंगे ही, किसानों की मुश्किलें और बढ़ जाएंगी। डीजल का व्यापक इस्तेमाल बड़ी गाड़ियों में भी हो रहा है, लिहाजा अच्छी अर्थनीति तो यही होती कि डीजल गाड़ियों पर टैक्स बढ़ाकर खेती को राहत दी जाती।
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लेकिन सरकार का ताजा फैसला बताता है कि वह एक ही लाठी से सबको हांकने में ज्यादा यकीन करती है। चूंकि माल ढुलाई डीजल से ही होती है, ऐसे में इसके दाम बढ़ने का महंगाई बढ़ने से सीधा संबंध है। इससे पूर्व सरकार बजट से पहले रेल किराया बढ़ा ही चुकी है। पिछले महीने मुद्रास्फीति घटने के बावजूद रिजर्व बैंक ने ब्याज दर में कमी की संभावना से इंकार कर दिया था। अब जब मुद्रास्फीति में आगे बढ़ोतरी की आशंका है, तो आने वाले दिन आर्थिक रूप से कठिन ही होंगे।
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