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घाटी में विकास की चुनौती

Tue, 25 Jun 2013 08:51 PM IST
नई दिल्ली
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मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी का जम्मू-कश्मीर दौरा केंद्रीय सत्ता के दो सर्वाधिक महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों की संयुक्त यात्रा के कारण ही नहीं, बल्कि देश के सर्वाधिक संवेदनशील राज्य में बुनियादी ढांचे को मजबूती देने की केंद्र की कोशिशों के कारण भी ध्यान देने लायक है।
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अगले लोकसभा चुनाव से पहले सूबे के विकास कार्यों का जायजा लेने, कुछ परियोजनाओं का उद्घाटन करने और संभवतः कुछ नए तोहफों की घोषणा करने को कोई चाहे, तो चुनावी राजनीति से जोड़ सकता है, लेकिन इससे यह सच्चाई झुठलाई नहीं जा सकती कि पिछले करीब एक दशक में राज्य की विकास यात्रा की दिशा में काम हुआ है, चाहे वह सड़कों का निर्माण हो, रेल पटरियों का विस्तार हो, साक्षरता अभियान हो, या दुर्गम-दूरस्थ गांवों में विद्युतीकरण हो।

काजीगुंड-बनिहाल रेल खंड के शुरू होने से न सिर्फ दुर्गम इलाके के बीमार और जरूरतमंद लोग सुगमता से श्रीनगर पहुंच सकेंगे, बल्कि अब रेल पटरियों का घाटी से जम्मू तक विस्तार का एक चरण भी पूरा हो चुका है। इसके बावजूद राज्य में शांति और सुरक्षा का मौजूदा हाल ही नहीं, प्रधानमंत्री के इस दौरे के प्रति राज्य के लोगों की उदासीनता भी बेहद चौंकाने वाली है।
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प्रधानमंत्री ने यह तो कहा कि 2012 में राज्य में आतंकवादी घटनाएं बहुत कम हुईं, लेकिन उन्होंने इस पर चुप्पी साध ली कि इस साल के शुरुआती छह महीनों में न सिर्फ आतंकी हमले बढ़े हैं, बल्कि सीमा पार से युद्धविराम समझौते का उल्लंघन भी लगातार हो रहा है। कल पुंछ में पाक सैनिकों की ओर से शुरू हुई गोलाबारी इस महीने की ऐसी चौथी घटना है। प्रधानमंत्री के दौरे से पहले, अमरनाथ यात्रा शुरू होने के ठीक पूर्व और अमेरिकी विदेश मंत्री के यहां होते हुए आतंकवादियों ने सुरक्षा बलों को दो बार निशाना तो बनाया ही, उनकी जिम्मेदारी भी ली।

रेड अलर्ट होने के बावजूद मुट्ठी भर आतंकवादी अपनी मंशा में कामयाब हो गए, तो बहुत गंभीर मामला है। प्रधानमंत्री के दौरे के समय अलगाववादियों के आह्वान पर सामान्य जनजीवन का ठप हो जाना भी बहुत कुछ कह जाता है। ऐसे में, विकास कार्यों के साथ-साथ पड़ोसी देश की मंशा और अलगाववादियों के इरादों को भांपते हुए कदम उठाना भी जरूरी है।
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