करीब दो साल पहले उत्तराखंड के केदारनाथ में आई तबाही भीषणतम त्रासदियों में से एक थी, जिसमें हजारों लोग मारे गए, अनेक लोग लापता हो गए, कई गांव नक्शे से विलुप्त हो गए और राज्य की अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो गई। ऐसी एक त्रासदी के बाद राहत, पुनर्वास और पुनर्निर्माण का काम प्रतिबद्धता के अलावा संवेदना की भी मांग करता है।
लेकिन तबाही की दूसरी बरसी से पहले एक आरटीआई के जरिये हुआ यह खुलासा चौंकाने वाला है कि उस दुखद अवसर पर भी कुछ अधिकारियों ने राहत और पुनर्वास के नाम पर राजकोष को चूना लगाने से परहेज नहीं किया। हमारी कार्यसंस्कृति में भ्रष्टाचार नई चीज नहीं है, सरकारी कार्यसंस्कृति में तो और भी नहीं। लेकिन जब बाढ़ की विनाशलीला के बीच फंसे पड़े पर्यटकों और दुर्गम इलाकों में स्थानीय लोगों को बचाने और उनकी पीड़ा को महसूस करने की जरूरत थी, तब भी कुछ अधिकारी मौज-मस्ती और बिलों के फर्जीवाड़े में जुटे थे, तो इससे उनके सिर्फ भ्रष्ट होने का नहीं, बल्कि संवेदनहीन होने का भी पता चलता है।
जब तबाही में बचे लोगों के लिए सिर पर छत और भोजन की जरूरत थी, तब ये अधिकारी आलीशान होटलों में टिककर चिकन-मटन और गुलाब जामुन खा रहे थे। कहा तो यह भी जा रहा है कि जो राशि पीड़ितों के खाने के लिए भेजी गई, उससे भी इन अधिकारियों ने अपनी दावत का इंतजाम किया। इन्होंने जिस तरह होटल में एक दिन ठहरने के हजारों रुपये के बिल दिए; पहाड़ों में स्कूटरों के जरिये राहत और पुनर्वास के असंभव काम को अंजाम दिया, एक खास दुकान से लगातार रेनकोट की खरीदारी की, और पेट्रोल वाहनों के लिए डीजल के बिल दिए, उनसे यह साफ है कि केदारनाथ की तबाही इस देश के लिए कितनी भी बड़ी त्रासदी क्यों न रही हो, इन बेईमान अधिकारियों के लिए खाने-कमाने का एक जरिया थी।
राहत राशि में जिस तरह घोटाले, मसलन-एक ही व्यक्ति को दो बार चेक देने, की बात सामने आई है, वह बताती है कि खुद खाने के अलावा कुछ लोगों को उपकृत करने का काम भी किया गया। चूंकि यह बेहद गंभीर मामला है, इसलिए इसकी गहन जांच तो जरूरी है ही, भ्रष्ट अधिकारियों की शिनाख्त करने के साथ-साथ उन्हें दंडित करके ही राज्य सरकार अपनी छवि पर लगे धब्बे से मुक्त हो सकती है।