इस वर्ष के पद्मभूषण सम्मान के लिए खेल मंत्रालय द्वारा नाम की सिफारिश न करने पर बैडमिंटन की चर्चित शख्सियत साइना नेहवाल का दुखी होना जितना चकित करने वाला है, उससे कहीं अधिक स्तब्ध करता है।
वह निर्विवाद रूप से भारतीय बैडमिंटन की शिखर प्रतिभाओं में से हैं और पद्मभूषण सम्मान की हकदार भी। पहले प्रकाश पादुकोण और फिर पुलेला गोपीचंद ने जिस खेल में भारत को वैश्विक पहचान दिलाई, साइना नेहवाल ने उसे शिखर पर पहुंचा दिया है। बैडमिंटन के कई सुपर सीरीज खिताब उन्होंने जीते हैं, करियर की सर्वश्रेष्ठ दूसरी रैंकिंग पर वह पहुंची हैं, और ओलंपिक में देश के लिए बैडमिंटन का इकलौता पदक भी उन्हीं के नाम है।
इसके बावजूद इस साल यह नागरिक सम्मान न मिलने की संभावना से उनका दुखी होना, फिर उसे सार्वजनिक तौर पर जाहिर करना हैरान करने वाला आचरण है, जिसकी प्रशंसा नहीं की जा सकती। इस साल पद्मभूषण न मिलने से साइना का कद कम नहीं हो जाएगा, हां, सम्मान के लिए सार्वजनिक तौर पर इच्छा जताने से व्यक्ति की गरिमा जरूर घटती है। बल्कि उन्हें तो खुश होना चाहिए कि वह जिस दौर में खेल रही हैं, उस समय खिलाड़ियों का समुचित मूल्यांकन होता है और बाजार भी उनकी कीमत पहचानता है। आज सिर्फ पुरस्कार ही नहीं बढ़े हैं, बल्कि प्रतिभाओं को सम्मानित करने के कई दूसरे मंच भी हैं। जबकि कुछ दशक पहले तक स्थिति यह थी कि अनेक प्रतिभाशाली खिलाड़ी चर्चा और पुरस्कार से वंचित रह जाते थे। सम्मान तो छोड़िए, फुटबॉल, हॉकी और दूसरे खेलों की कई बड़ी प्रतिभाओं ने पूरी जिंदगी गरीबी में गुजार दी है।
हालांकि इससे भी इन्कार नहीं कि हाल के दशकों में पुरस्कारों के चयन में कमोबेश राजनीति होने लगी है, जिस वजह से विवाद बढ़े हैं। स्थिति यह हो गई है कि पिछले दिनों मुक्केबाज मनोज कुमार को कानूनी लड़ाई लड़कर अर्जुन पुरस्कार हासिल करना पड़ा! यह विद्रूप नहीं, तो और क्या है कि पिछले वर्ष मलाला यूसुफजई के साथ संयुक्त रूप से शांति के नोबल के लिए चुने गए कैलाश सत्यार्थी को अपने देश में किसी पुरस्कार के लायक नहीं समझा गया? सम्मानों की अपनी गरिमा होती है। जब पुरस्कार अपना महत्व खो रहे हैं, तो या तो सरकार इन्हें बंद कर दे या प्रतिभाओं के चयन के लिए एक ऐसी व्यवस्था बनाए, जो विवादरहित हो।