यूपीए सरकार का दूसरा कार्यकाल उसकी कमोबेश उपलब्धियों के अलावा इसलिए भी जाना जाएगा कि उसने कई फैसले संसद को दरकिनार करते हुए लिए। ऐसे निर्णयों के पीछे अपनी उपलब्धियां जताने की आतुरता दिखती थी, तो बिल्कुल आखिरी दिनों में स्नूपगेट मामले की जांच का फैसला, जिसे अपने ही सहयोगियों के विरोध पर उसे टालना पड़ा, विपक्ष के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के प्रति उसके बदले की भावना का भी सूचक था।
अलबत्ता प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में कैबिनेट की आखिरी बैठक में जो निर्णय लिए गए, उन्हें इस श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। इनमें से सबसे महत्वपूर्ण फैसला आगामी थलसेना प्रमुख के रूप में लेफ्टिनेंट जनरल दलबीर सिंह सुहाग के नाम पर मुहर है। सरकार के इस फैसले पर कई वजह से भाजपा की आपत्ति थी।
एक आपत्ति तो आचार संहिता के उल्लंघन को लेकर ही थी। पर चुनाव आयोग ने यह कहते हुए सरकार को हरी झंडी दी कि रक्षा मामलों से जुड़े फैसले में आचार संहिता आड़े नहीं आती। चूंकि अपने यहां रक्षा मामलों से जुड़े फैसले तीन महीना पहले करने का प्रावधान है; खुद एनडीए सरकार ने भी अपने कार्यकाल के आखिरी सप्ताह में नौसेना प्रमुख के तौर पर एडमिरल अरुण प्रकाश की नियुक्ति की थी। इसलिए सुहाग की नियुक्ति के यूपीए सरकार को फैसले को लीक से हटकर नहीं मान सकते।
फार्मा क्षेत्र में 1,400 करोड़ रुपये के सीधे विदेशी निवेश के फैसले पर आखिरी बैठक में मुहर लगाना थोड़ा चौंकाने वाला जरूर है। एक तो इसलिए कि यह सौदा प्रधानमंत्री कार्यालय और औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग में मतभेद के कारण अटकता रहा, फिर यूपीए की वापसी न होने की संभावना के बीच इस फैसले का उसे कोई श्रेय शायद ही मिले। पर विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड ने विगत फरवरी में इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी थी, लिहाजा कैबिनेट ने इस पर मुहर लगाकर वस्तुतः औपचारिकता ही निभाई है।
भेल के विनिवेश पर कैबिनेट की मुहर को भी इसी तरह देखना चाहिए, क्योंकि वित्त मंत्रालय ने तो इसकी 4.66 फीसदी हिस्सेदारी मार्च में ही एलआईसी को बेच दी थी। इसलिए मनमोहन सिंह सरकार की आखिरी बैठक में लिए गए फैसले को सरकारी कामकाज की निरंतरता के लिहाज से ही देखना उचित होगा।