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बेटी के कातिल

Mon, 25 Nov 2013 07:19 PM IST
नई दिल्ली
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हमारे समय की सबसे बड़ी 'मर्डर मिस्ट्री' माने जा रहे आरुषि-हेमराज हत्याकांड पर सीबीआई की विशेष अदालत का फैसला स्तब्ध करने वाला है। अभियोजन के तौर-तरीकों और लंबी कानूनी प्रक्रिया पर भले ही सवाल उठाए जाएं, मगर अदालत ने आखिरकार आरुषि के माता-पिता डॉ नुपूर और राजेश तलवार को ही उसकी और घरेलू नौकर हेमराज की हत्या का दोषी पाया है।
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असल में 16 मई, 2008 की जिस रात इस दोहरे हत्याकांड को अंजाम दिया गया था, उसके बाद से परिस्थितिजन्य साक्ष्य तलवार दंपति की ओर ही इशारा कर रहे थे। अभियोजन का यह तर्क अपने आपमें काफी मजबूत था कि जिस फ्लैट में चार लोग हों और दो की हत्या हो जाए और बचे दो को कुछ पता ही नहीं चले, यह कैसे संभव है!

निश्चित रूप से इस मामले में सीबीआई की भूमिका भी शुरू से सवालों के घेरे में रही, जिसने एक समय इस मामले को बंद करने तक का फैसला ले लिया था। मगर यह भी नहीं भूलना चाहिए कि तलवार दंपति ने भी अपने स्तर पर हर तरह के कानूनी दांव-पेच आजमाने में कोई कसर नहीं छोड़ी; स्थिति यहां तक भी आई कि सर्वोच्च अदालत को उन्हें कई बार फटकार तक लगानी पड़ी। उनके व्यवहार से ऐसा लग रहा था, मानो वह इस मामले को लंबा खींचना चाहते हैं।
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तलवार दंपति वाकई कोई पेशेवर हत्यारे नहीं हैं, लेकिन उन्होंने जो कुछ किया, उसकी सभ्य समाज में कोई जगह नहीं है। यह मामला कहीं न कहीं उस जीवनशैली पर भी सवालिया निशान है, जहां वर्जनाएं तेजी से टूट रही हैं।

हैरत की बात है कि दोषी ठहराए जाने के बावजूद तलवार परिवार का व्यवहार पीड़ितों जैसा है। जबकि जरूरत उन तीन नौकरों के बारे में भी सोचने की है, जिन्हें एक समय हत्यारा करार दिया गया था। क्या इस पर विचार नहीं होना चाहिए कि उन्हें और उनके परिजनों को जो यातनाएं झेलनी पड़ीं, उसकी भरपाई कैसे होगी?

और फिर हेमराज के परिजनों पर जो बीत रही है, उसका क्या? इस फैसले से तलवार दंपति का असंतुष्ट होना स्वाभाविक है, मगर उनके लिए ऊपरी अदालतों के दरवाजे खुले हुए हैं, जहां उनके वकील जाने का ऐलान कर ही चुके हैं। नुपूर और राजेश तलवार को भारतीय न्याय व्यवस्था पर भरोसा रखना चाहिए।
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