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हिंसक हड़ताल के खतरे

Wed, 20 Feb 2013 08:47 PM IST
नई दिल्ली
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संसद के बजट सत्र से ठीक पहले 11 बड़े श्रमिक संगठनों की हड़ताल से उपजी हिंसा, तोड़फोड़ और अव्यवस्था ने सर्वोच्च अदालत की उन टिप्पणियों की ओर ध्यान खींचा है, जिसमें वह स्पष्ट कर चुकी है कि हड़ताल या बंद संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों के दायरे में नहीं आते।
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इसके साथ ही उसने हड़ताल के दौरान तोड़फोड़ रोकने के लिए दिशा-निर्देश भी जारी किए हैं, मगर सरकारें राजनीतिक मजबूरियों के चलते अक्सर इसकी अनदेखी करती हैं। ऐसा ही इस बार भी हुआ, वरना सरकार की ओर से समय रहते श्रमिक संगठनों के भारत बंद को रोकने की पहल की जाती।

सच्चाई यह है कि श्रमिक संगठनों ने तकरीबन चार महीने पहले ही हड़ताल का नोटिस दिया था, इसके बावजूद सरकार इसे टाल नहीं सकी। गौर करने वाली बात यह भी है कि इस बार की हड़ताल में वामपंथी श्रमिक संगठनों के साथ ही शिवसेना और भाजपा के आनुषांगिक संगठन भी शामिल हैं, जिससे उनकी तैयारी का पता चलता है।
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निश्चय ही हड़ताल की वैधानिकता पर बहस की गुंजाइश है, मगर इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि जबसे देश ने आर्थिक सुधारों और उदारीकरण की प्रक्रिया अपनाई है, श्रमिक हाशिये पर धकेले जा रहे हैं, और श्रम कानूनों को ताक पर रख दिया गया है।

असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की स्थिति बद से बदतर हुई है और उनकी सामाजिक सुरक्षा की भी कोई व्यवस्था नहीं है। खुद अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने यूपीए के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में सुधारों के दूसरे दौर की बात की थी और समावेशी विकास का वायदा किया था। मगर यह विकास एकांगी साबित होता जा रहा है। हालांकि यह भी सच है कि यूपीए की जगह कोई भी सरकार हो, वह अब आर्थिक सुधारों के रास्ते से पीछे नहीं हट सकती।

ऐसे में एक ही रास्ता बचता है कि सुधारों के साथ संतुलन बनाया जाए। अच्छा तो यह होता कि जिन मुद्दों को लेकर श्रमिक संगठन सड़कों पर उतरे हैं, उन्हें लेकर संसद के भीतर दबाव बनाया जाता, ताकि आम लोगों को परेशानी नहीं होती। इस तरह की हिंसक हड़ताल से तो श्रमिक संगठन आम लोगों की सहानुभूति ही खो रहे हैं, बावजूद इसके कि उनकी मांगों में महंगाई का मुद्दा भी शामिल है।
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