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पूर्व सैनिकों की सुध

Sun, 06 Sep 2015 08:09 PM IST
नई दिल्ली
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एक रैंक से रिटायर होने वाले सैन्यकर्मियों की एक समान पेंशन की चार दशक से भी पुरानी मांग आखिरकार केंद्र सरकार ने मान ली है, तो यह सचमुच स्वागतयोग्य है। अभी तक स्थिति यह है कि कुछेक दशक पहले रिटायर हुए और अभी रिटायर होने वाले समान रैंक के सैन्यकर्मियों की पेंशन में भारी फर्क है।
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सिर्फ यही नहीं कि दिनोंदिन बढ़ती महंगाई के बीच पूर्व सैनिकों के लिए कम पेंशन में गुजारा करना मुश्किल है, बल्कि अलग-अलग समय में एक ही पद से रिटायर हुए सैन्यकर्मियों के पेंशन में यह अंतर बुजुर्ग हो चुके पूर्व सेनानियों के प्रति हमारी आम उपेक्षा का भी सुबूत था। सैनिक चाहे आज रिटायर हों या बीस-तीस साल पहले, सबने एक जैसी चुनौतियां झेली हैं। प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच देश की सीमाओं की रक्षा करने वाले ये लोग सम्मान के साथ-साथ बेहतर सुविधाओं के भी हकदार हैं।

किसी पूर्व सैनिक को सिर्फ इसलिए इन सुविधाओं से वंचित नहीं रखा जा सकता कि वह पहले रिटायर हुआ है। सरकार और पूर्व सैन्यकर्मियों के बीच जो समझौता हुआ है, उसके तहत बढ़ा हुआ पेंशन एक जुलाई, 2014 से लागू होगा, और इसके लिए 2013 को आधार वर्ष माना जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह कहकर, कि बढ़े हुए पेंशन का लाभ सभी पूर्व सैन्यकर्मियों को मिलेगा, इस आशंका को खत्म करने की कोशिश की है कि स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले चुके सैनिकों को इसका फायदा नहीं मिलेगा, जैसा कि पहले सरकार की तरफ से बताया गया था।
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हालांकि इस सच्चाई की भी अनदेखी नहीं करनी चाहिए कि पूर्व सैनिकों की सभी मांगें पूरी करने से अर्थव्यवस्था पर बहुत बड़ा बोझ पड़ेगा। इसीलिए सरकार ने हर पांचवें साल पेंशन की समीक्षा करने की बात कही है। इसके बावजूद कई मुद्दों पर से धुंध अभी पूरी तरह छंटी नहीं है। जैसे, भले ही सरकार की तरफ से यह भरोसा दिलाया जाए कि एक सदस्यीय न्यायिक आयोग कोई वेतन आयोग नहीं होगा, पर पूर्व सैन्यकर्मियों का तर्क है कि ऐसे किसी आयोग में अगर उनके भी प्रतिनिधि हों, तो वह उनके हक में अच्छा होगा। इसके अलावा उन्हें यह भरोसा भी देना चाहिए कि बढ़े हुए पेंशन का लाभ और बकाया राशि का भुगतान जल्दी होगा। भूलना नहीं चाहिए कि पूर्व सैन्यकर्मियों को उनका हक देने में पहले ही बहुत देर हो चुकी है।
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