उत्तराखंड में जिस तरह मौतों का आंकड़ा बढ़ रहा है और तबाही के दृश्य सामने आ रहे हैं, उससे साफ है कि इस आपदा से उबरने में इस पहाड़ी राज्य को लंबा वक्त लगेगा। न जाने कितने गांव और कस्बे गंगा, भागीरथी और अलकनंदा की भेंट चढ़ गए और यदि पचास हजार से अधिक लोग अब भी फंसे हुए हैं, तो इसकी भीषणता का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।
वहां एक दिन में ही जितनी बारिश हुई और बादल फटने के बाद जैसी तबाही मची, उस पर किसी का बस नहीं था, लेकिन इसने दिखाया है कि पारिस्थितिकी के लिहाज से इस अति संवेदनशील राज्य के साथ कैसा खिलवाड़ किया जा रहा है। दरअसल विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त यह पहाड़ी राज्य आज विकास की विसंगतियों से जूझ रहा है।
राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण ने तो गोमुख से उत्तरकाशी के 130 किलोमीटर क्षेत्र को इको सेंसिटिव जोन घोषित करने का सुझाव दिया था, जिसके तहत केंद्रीय वन और पर्यावरण मंत्रालय ने दिसंबर, 2012 में अधिसूचना भी जारी कर दी, लेकिन राज्य सरकार ने न केवल इसे नामंजूर कर दिया, बल्कि इसके खिलाफ विधानसभा में एक प्रस्ताव भी पारित करवा दिया था।
यदि इस अधिसूचना पर अमल होता, तो उस क्षेत्र में खनन और अंधाधुंध निर्माण पर रोक लग जाती। ऋषिकेश के साथ ही चारधाम के आसपास और उनके रास्तों में पर जिस तरह से निर्माण हुए हैं और जिस तरह पनबिजली परियोजनाएं स्थापित की गई हैं, उससे पूरा पर्यावरण संतुलन बिगड़ गया है।
वास्तव में इस आपदा में बाहर से आए तीर्थयात्रियों का ही नुकसान नहीं हुआ है, बल्कि राज्य की आधारभूत संरचना भी ध्वस्त हो गई, जिसने इसे न जाने कितने दशक पीछे धकेल दिया। हैरत की बात यह है कि इतने संवेदनशील राज्य में जहां, बादल फटने और चट्टानें खिसकनें की घटनाएं होती रहती हैं, राज्य सरकार ने आपदा प्रबंधन को गंभीरता से नहीं लिया।
कैग की रिपोर्ट बताती है कि 2007 में गठित राज्य आपदा प्रबंधन की अब तक एक भी बैठक नहीं बुलाई गई! साफ है कि यह आपराधिक लापरवाही है। यदि वहां कुछ राहत मिलती दिख भी रही है, तो उसमें सेना और आईटीबीपी के जांबाज जवानों का योगदान अधिक है, जो अपनी जान जोखिम में डालकर लोगों को बचा रहे हैं। यह हादसा सिर्फ उत्तराखंड ही नहीं, हिमालय क्षेत्र के सभी राज्यों के लिए बड़ा सबक है, जहां विकास के मौजूदा मॉडल पर नए तरह से सोचने की जरूरत है।