देश की सर्वोच्च अदालत ने समलैंगिक संबंधों को अवैध करार देकर इस बेहद जटिल मानवीय रिश्ते को एक बार फिर से विमर्श के केंद्र में ला दिया है। अदालत ने इससे संबंधित भारतीय दंड विधान की धारा 377 में संशोधन करने या उसे निरस्त करने का फैसला संसद पर छोड़ दिया है।
देश की सर्वोच्च अदालत ने दिल्ली हाई कोर्ट के वर्ष 2009 के फैसले को पलटकर 1861 के इस कानून को न केवल वैध करार दिया है, बल्कि भारतीय संस्कृति और धार्मिक भावनाओं का भी हवाला दिया है। असल में समलैंगिक संबंधों को वैध करार देने वाले दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को अनेक धार्मिक-सांस्कृतिक संगठनों ने ही चुनौती दी थी।
इस कानून के तहत समलैंगिक संबंध बनाने पर उम्र कैद तक का प्रावधान है। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में समलैंगिकता को स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार से जोड़ा था। हालांकि ये दुनिया भर में विवाद का विषय है। 53 राष्ट्रमंडल देशों में से ही 41 देशों में समलैंगिक संबंधों की अनुमति नहीं है, पर दुनिया के बहुत से देशों में समलैंगिक संबंध इतने स्वीकार्य हैं कि विवाह तक की अनुमति दी जाने लगी है।
जो लोग इस तरह के संबंध का विरोध करते हैं, वे मानते हैं कि यह एक तरह की विकृति है। लेकिन इससे कौन इंकार कर सकता है कि भारतीय समाज में भी इस तरह के संबंध रहे हैं। खजुराहो के शिल्प इसके गवाह हैं। मशहूर कथाकार इस्मत चुगतई की लिहाफ से लेकर लोककथाकार विजयदान देथा की कथा तीजा-बीजा तक में समलैंगिकों की पीड़ा महसूस की जा सकती है।
इस फैसले को समलैंगिक समुदाय ही नहीं, बल्कि एमनेस्टी इंटरनेशनल सहित अनेक संगठन मानवाधिकारों और मौलिक अधिकारों के हनन से जोड़कर देख रहे हैं। एडिशनल सॉलिसिटर जनरल इंदिरा जयसिंह की यह प्रतिक्रिया गौर करने लायक है कि शीर्ष अदालत यों तो अनेक मुद्दों और नीतिगत फैसलों की न्यायिक समीक्षा करता रहा है, मगर उसने इस मामले में गेंद संसद के पाले में डाल दी है!
बदलते समाज में संस्कृति का हवाला देकर पुराने कानूनों के भरोसे नहीं रहा जा सकता। दूसरी ओर समलैंगिक समाज को भी समझना होगा कि वे भारत में रहकर एकाएक पश्चिम के कुछ देशों की तरह यौन-स्वतंत्रता हासिल नहीं कर सकते।