सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर गठित जस्टिस आर एम लोढ़ा कमेटी की भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) में आमूलचूल बदलाव लाने की सिफारिशों में से कितनी मंजूर की जाती हैं, कहना मुश्किल है, पर इस रिपोर्ट ने भारतीय क्रिकेट प्रशासन को आईना जरूर दिखा दिया है। संभवतः क्रिकेट में राजनीतिक वर्ग, नौकरशाही और उद्योग जगत की जितनी दखलंदाजी है, उतनी किसी और खेल में नहीं।
जस्टिस लोढ़ा ने पदाधिकारियों के लिए उम्र और कार्यकाल की सीमा तय करने की सिफारिश करने के साथ ही यह भी कहा है कि मंत्रियों को बोर्ड के प्रशासन से दूर रहना चाहिए। वास्तव में मुंबई और बंगाल के क्रिकेट संघों को छोड़ दिया जाए, तो अधिकांश क्रिकेट संघों की कमान राजनीतिकों, नौकरशाहों या फिर उद्योगपतियों के हाथ में है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण तो बीसीसीआई ही है, जिसमें लंबे समय से उद्योगपतियों और राजनीतिकों का कब्जा रहा है। यही हाल आईपीएल का है, जिसने क्रिकेट की विश्वसनीयता को ही दांव पर लगा दिया।
असल में जस्टिस लोढ़ा कमेटी का गठन जस्टिस मुकुल मुद्गल कमेटी के साथ ही किया गया था, जिसे आईपीएल में सट्टेबाजी की जांच की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। यह बात बिल्कुल सही है, जैसा कि इयान चैपल ने हाल ही में कहा था कि जरूरी नहीं कि सारे क्रिकेटर अच्छे प्रशासक साबित हों। मगर क्रिकेट की साख को बचाने के लिए जरूरी है कि इसे राजनीतिक वर्ग, नौकरशाही और उद्योग जगत के गठजोड़ से बचाया जाए। ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि पूर्व क्रिकेटरों को प्रशासन और प्रबंधन में अधिक जिम्मेदारी दी जाए।
बात सिर्फ बीसीसीआई की नहीं है, विभिन्न क्रिकेट संघों का भी हाल कैसा है, यह दिल्ली ऐंड डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट एसोसिएशन (डीडीसीए) में कथित भ्रष्टाचार को लेकर मचे घमासान से समझा जा सकता है। जस्टिस लोढ़ा कमेटी की बीसीसीआई को सूचना के अधिकार के दायरे में लाने की सिफारिश को मंजूर करने से वाकई बड़ा बदलाव आ सकता है, क्योंकि इससे उसे जवाबदेह बनाया जा सकता है। अलबत्ता क्रिकेट में सट्टेबाजी को वैध करने की उनकी सिफारिश से इत्तफाक रखना मुश्किल है, क्योंकि आईपीएल में हुई सट्टेबाजी के कारण यह खेल पहले ही काफी बदनाम हो चुका है।