अबू सलेम के मामले में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला इस अर्थ में दूरगामी है कि इसमें स्पष्ट शब्दों में इस माफिया सरगना के प्रत्यर्पण को उचित और उसके खिलाफ मुकदमा चलाए जाने को जायज ठहराया गया है।
वर्ष 1993 के मुंबई बम विस्फोट की साजिश रचने के अलावा हत्या, फिरौती और अपहरण के अनेक मामलों को अंजाम देने वाला अबू सलेम फर्जी पासपोर्ट के जरिये पुर्तगाल भाग जाने के बाद अगर यह समझ रहा था कि वह भारतीय कानून-व्यवस्था की पकड़ से दूर निकल गया है, तो यह उसका भोलापन था।
हालांकि अगर उसे हमें सौंपा नहीं जाता, तो दूसरे कई दुर्दांत अपराधियों और आतंकवादियों की तरह वह भी अब तक भारतीय कानून की पकड़ से दूर ही रहता। यह भी सही है कि मृत्युदंड न देने और पच्चीस वर्षों तक कैद न रखने की शर्तों पर ही पुर्तगाल की सरकार ने उसका प्रत्यर्पण किया है। पर इसका अर्थ यह नहीं कि उसके खिलाफ अतिरिक्त कानूनी धाराएं लगने पर उसका प्रत्यर्पण ही रद्द करने की बात की जाए।
यूरोप में अपराधियों और आतंकवादियों के मानवाधिकारों का ख्याल रखा जाता है, तो यह अपनी जगह सही है, लेकिन ऐसे में किसी के अपराधों की अनदेखी क्यों होनी चाहिए! अबू सलेम इसी देश में पैदा हुआ, उसने यहीं अपराध किए, जो छोटे-मोटे जुर्म भी नहीं थे।
जेल में उस पर दो-दो बार हुए हमले भी बताते हैं कि उसे शिकंजे में कसे जाने से देश के बाहर छिपे हुए अपराधियों को मुंबई विस्फोट मामले की सच्चाई सामने आ जाने का डर है। विद्रूप देखिए, पुर्तगाल की अदालत ने उसका प्रत्यर्पण रद्द होने की बात की, तो अबू सलेम उसी आधार पर अब यहां की अदालतों में अपने खिलाफ चल रहे तमाम मामले खत्म करने की मांग कर रहा था।
सर्वोच्च न्यायालय ने बिल्कुल ठीक कहा है कि पुर्तगाल की अदालत का फैसला यहां की अदालत के लिए बाध्यकारी नहीं हो सकता। हां, प्रत्यर्पण के बाद उस पर लगाए गए आरोपों को वापस लेने पर सहमति जरूर बन चुकी है। सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला उन भगोड़े अपराधियों और आतंकवादियों के लिए भी संदेश है कि देर-सबेर अगर वे शिकंजे में फंसते हैं, तो उनके खिलाफ भी ठीक इसी तरह कार्रवाई होगी।