विगत सात दिसंबर को छत्तीसगढ़ के प्रायः सभी प्रमुख अखबारों ने मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह की किसानों के नाम लिखी एक पाती प्रमुखता से प्रकाशित की। पत्र के रूप में छपे इस सरकारी विज्ञापन में मुख्यमंत्री ने लिखा है ''... सूखे खेतों को देखकर दुख होना स्वाभाविक है, लेकिन संकट की इस घड़ी में हम सबको धैर्य और हिम्मत से काम लेने की जरूरत है, ताकि समस्या का हल मिल जुलकर किया जा सके। आपका जीवन आपके परिवार के लिए और हम सब के लिए बहुत कीमती है। अगर आपको किसी भी प्रकार की उलझन महसूस हो रही हो, तो अपने पास के कृषि विभाग और राजस्व विभाग के अधिकारियों से अथवा अपने जिले के कलेक्टर से संपर्क करें। मैं आपको विश्वास दिलाना चाहता हूं कि प्राकृतिक विपदा की इस घड़ी में छत्तीसगढ़ सरकार हर कदम पर हर संभव मदद के लिए आपके साथ है।...''
इस पत्र में मुख्यमंत्री रमन सिंह ने 117 तहसीलों को सूखा ग्रस्त करने के साथ ही किसानों से संबंधित कुछ घोषणाओं का भी जिक्र किया है। यह उस मुख्यमंत्री की अपील है, जिन्हें कुछ वर्ष पहले दो रुपये किलो चावल की उनकी योजना के कारण 'चाऊर (चावल) वाले बाबा' के नाम से नवाजा गया था! पिछले विधानसभा चुनाव में उनकी जीत के पीछे छत्तीसगढ़ की जन वितरण प्रणाली को भी एक अहम कारण माना गया था। यहां तक कि अनेक अर्थशास्त्रियों ने दूसरी राज्य सरकारों को छत्तीसगढ़ की पीडीएस नीति को अपनाने की सलाह तक दे डाली थी।
जिस दिन मुख्यमंत्री की यह अपील अखबारों में छपी थी, उसी दिन उन्हीं अखबारों में राज्य के विभिन्न हिस्सों में किसानों की आत्महत्या से संबंधित कुछ खबरें भी प्रकाशित हुई थीं। इसी दिन मुख्यमंत्री रमन सिंह के निर्वाचन क्षेत्र राजनांदगांव में, जहां से उनके पुत्र अभिषेक सिंह सांसद भी हैं, राज्य के पांच जिलों के किसानों ने एक बड़ी रैली आयोजित कर अपनी बेबसी की ओर ध्यान खींचने की कोशिश की थी। इस रैली में पांच हजार से अधिक किसान शामिल हुए थे और इससे तमाम राजनीतिक दलों को दूर रखा गया था।
ये खबरें बताती हैं कि 'धान के कटोरे' में कैसा तूफान मचा हुआ है।
पिछले एक हफ्ते के दौरान ही कम से कम पांच किसानों की आत्महत्या की खबरें सामने आई हैं। इनमें कर्ज से लदे एक किसान ने बैंक और सूदखोरों के तगादे से परेशान होकर अपनी बेटी की सगाई से ठीक पहले जान दे दी थी। वहीं एक किसान ने धान के कम दाने देख कर सदमे में आकर खुदकुशी कर ली। खुदकुशी करने वाले एक किसान को तीन दिन पहले ही कर्ज का नोटिस मिला था।
हालांकि आधिकारिक तौर पर इनमें से किसी की भी पुष्टि किसान आत्महत्या के रूप में नहीं की गई है। भूख से होने वाली मौतों और किसान आत्महत्या के आंकड़ों को लेकर देश की सरकारों का यही रवैया रहा है। मगर यह बात कई बार दोहराई जा चुकी है कि नई आर्थिक नीतियों के लागू होने के बाद विगत ढाई दशकों के दौरान देश में ढाई लाख से अधिक किसान खुदकुशी कर चुके हैं।
भारत सरकार की नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में 2006 से 2010 के बीच हर साल औसतन 1,555 किसानों ने आत्महत्याएं की थीं। यानी छत्तीसगढ़ में हर दिन चार से अधिक किसानों ने आत्महत्या कर ली।
सीजीखबर डाट कॉम के संपादक आलोक प्रकाश पुतुल के मुताबिक जब इस मामले पर देश भर में सवाल खड़े हुए तो अगले साल यानी 2011 में किसानों की आत्महत्या का आंकड़ा ही शून्य में बदल गया। 2012 में किसानों की आत्महत्या की संख्या केवल चार बताई गई। 2013 में यह फिर से शून्य हो गई। छत्तीसगढ़ सरकार के आंकड़ों की बाजीगरी को समझने के लिए आपको 2009 के आंकड़े देखने होंगे। 2009 में छत्तीसगढ़ में किसानों की आत्महत्या के 1,802 मामले दर्ज हुए थे, जबकि स्वरोजगार के अन्य वर्ग में यह संख्या 861 थी। 2013 में जब किसानों की आत्महत्या का मामला ज़ीरो बता दिया गया तब स्वरोजगार के मामलों में आत्महत्या की संख्या 2077 हो गई।
मतलब यह है कि अब सरकार ने किसानों की आत्महत्या को स्वरोजगार की आत्महत्या के आंकड़ों में जोड़ दिया है।
सूखे से प्रभावित होने वाला छत्तीसगढ़ कोई अकेला राज्य नहीं है। कर्नाटक, महाराष्ट्र, ओडिशा, मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश भी सूखे से प्रभावित हैं, मगर छत्तीसगढ़ की बदतर स्थिति का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि राज्य के 27 में से 25 जिलों को राज्य सरकार ने सूखा घोषित कर रखा है।
पर चूंकि छत्तीसगढ़ में धान की फसल ही सबसे प्रमुख है और इसी से जुड़ी है दो रुपये किलो चावल वाली योजना। जाहिर है, जब धान ही नहीं होगा, तो इस योजना का चलना भी मुश्किल हो जाएगा। वैसे भी जन वितरण प्रणाली में फर्जी राशन कार्ड के मामले उजागर होने के बाद इस योजना की खामियां पहले ही उजागर हो चुकी हैं।
तो क्या चावल वाले बाबा का जादू अब खत्म हो रहा है?