पिछले करीब साढ़े आठ महीने से नई सरकार की बाट जोह रहे हताश दिल्लीवासियों के लिए सर्वोच्च न्यायालय की ताजा टिप्पणियों से उम्मीद जगी है। दिल्ली में जारी गतिरोध का खामियाजा तो जनता ही भुगत रही है। नई सरकार के गठन में हीलाहवाली पर शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार और उपराज्यपाल, दोनों के प्रति नाराजगी जताई है।
दिल्ली की मौजूदा स्थिति के लिए हालांकि तीनों राजनीतिक दल कमोबेश जिम्मेदार हैं। आम आदमी पार्टी ने दिल्ली की सत्ता संभालकर लोगों में जो उम्मीद पैदा की थी, जनलोकपाल मुद्दे पर सत्ता छोड़ उतना ही हताश किया। बाद में केजरीवाल ने स्वीकारा भी कि त्यागपत्र देकर उन्होंने गलती की थी।
कांग्रेस ने तो केजरीवाल सरकार को खुले मन से समर्थन भी नहीं दिया था। त्यागपत्र देते हुए केजरीवाल ने दोबारा चुनाव कराने की बात कही थी। पर केंद्र की तत्कालीन यूपीए सरकार ने उस पर चुप्पी साध ली थी। लोकसभा चुनाव में अपनी जीत के प्रति आश्वस्त यूपीए शायद अपने हिसाब से दिल्ली में फेरबदल करने की मंशा पाले हुए था।
पिछले करीब पांच महीने से केंद्र की सत्ता में काबिज भाजपा सरकार भी उसी रास्ते पर चल रही है। केंद्र यह तर्क देकर कि राष्ट्रपति शासन की अवधि तक नई सरकार के गठन की संभावनाएं तलाशने का औचित्य नहीं है, अपनी जवाबदेही से ही बच रहा है। यह भी सही है कि मौजूदा स्थिति में कोई दिल्ली में सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है।
फिर भी चुनाव कराना चूंकि एक खर्चीली प्रक्रिया है, ऐसे में उपराज्यपाल का नई सरकार के लिए राजनीतिक पार्टियों से मिलकर संभावनाएं तलाशना भी गलत नहीं है। लेकिन इस मामले में भाजपा का रुख बिल्कुल शुरू से विरोधाभासी है। उसने शुरू में कहा कि खरीद-फरोख्त के जरिये वह अल्पमत सरकार नहीं बनाएगी, पर विपक्षी विधायकों को तोड़ने की कोशिश के आरोप भी उस पर लगे हैं।
अभी उसने अदालत को बताया कि उपराज्यपाल उसे सरकार गठन के लिए बुलाने वाले हैं। अल्पमत में होते हुए वह सरकार कैसे बनाएगी? फिर इसी समय दोबारा चुनाव कराने की वेंकैया नायडू की टिप्पणी का क्या अर्थ निकाला जाए? राष्ट्रपति शासन की अवधि समाप्त होने में ज्यादा समय नहीं है, ऐसे में, खुद उपराज्यपाल को नई सरकार के गठन के लिए न सिर्फ सक्रिय होना चाहिए, बल्कि उनकी इस कोशिश में पारदर्शिता भी दिखनी चाहिए।