गरीबी की परिभाषा को लेकर अर्थशास्त्रियों, राजनीतिकों और समाजशास्त्रियों में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन यह त्रासद है कि आजादी मिलने के साढ़े छह दशक बाद भी देश में करोड़ों लोगों को बेहद अपमानजनक स्थितियों का सामना करना पड़ रहा है।
वर्ष 2004-05 में गरीबी के आकलन के लिए बनाई गई सुरेश तेंदुलकर समिति ने खर्च करने की क्षमता के आधार पर गरीबी की रेखा तय की थी।
इस समिति ने ग्रामीण क्षेत्रों के लिए यह सीमा 27 रुपये और शहरी क्षेत्र के लिए 33 रुपये रखी थी। इस पर हुए विवाद के बाद पिछली यूपीए सरकार के समय बनाई गई प्रधानमंत्री के पूर्व आर्थिक सलाहकार सी रंगराजन की अगुआई वाली समिति ने ग्रामीण क्षेत्रों में रोजाना 32 रुपये या उससे अधिक और शहरी क्षेत्रों में 47 रुपये या उससे अधिक खर्च करने की क्षमता रखने वाले को गरीब नहीं माना है!
असल में गरीबी को आंकने के लिए कई तरीके अपनाए जाते हैं। हमारे यहां दो वक्त के भोजन के साथ ही स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा पर होने वाले खर्च को इसमें शामिल किया गया है, जिसे पर्याप्त नहीं कहा जा सकता।
रंगराजन समिति का आकलन है कि 2009-10 के दौरान देश में 45 करोड़ से अधिक गरीब थे, जिनकी संख्या 2011-12 के दौरान आते-आते घटकर 36.3 करोड़ रह गई, लेकिन देश की आबादी के लिहाज से देखें, तो अब भी एक तिहाई लोग गरीबी की रेखा के नीचे हैं।
वास्तव में गरीबों की यह संख्या तेंदुलकर समिति के मानदंडों की तुलना में दस करोड़ अधिक है। इसके बावजूद गरीबों की यह सही तस्वीर नहीं है।
खाद्य पदार्थों की महंगाई जिस तेजी से बढ़ी है, उसे देखते हुए रंगराजन समिति की यह सीमा भी पर्याप्त नहीं लगती। साथ ही, यह समझने की भी जरूरत है कि गरीबों की संख्या का सीधा संबंध सामाजिक क्षेत्र से जुड़े कार्यक्रमों से भी होता है।
मसलन, खाद्य सुरक्षा और मनरेगा जैसे कार्यक्रम सीधे तौर पर गरीबों से ही जुड़े हुए हैं। जाहिर है, लाभार्थी गरीबों की संख्या अधिक होगी, तो सरकार पर सब्सिडी का बोझ भी बढ़ेगा।
इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि इन दोनों ही कार्यक्रमों की आड़ में भ्रष्टाचार को फलने-फूलने का मौका मिला है, पर इसका खामियाजा गरीबों को क्यों उठाना चाहिए? अपना पहला बजट पेश करने जा रही मोदी सरकार के सामने गरीबों से जुड़ी योजनाओं और चुनाव के समय किए गए विकास के दावों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है।